भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ४८—५० ] अध्याय ३ २९१ किसी विद्याका फल ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति है और किसीका फल इस शरीरमें रहते हुए ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाना है—इस प्रकार फलमें भेद क्यों किया गया है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद् दृष्टश्च तदुक्तम्॥ ३।३।५०॥ अनुबन्धादिभ्यः = भावविषयक अनुबन्ध आदिके भेदसे; प्रज्ञान्तरपृथक्- त्ववत् = उद्देश्यभेदसे की जानेवाली दूसरी उपासनाओके पार्थक्य ( भेद ) की भाँति; च = इसकी भी पृथक्ता है, ऐसा कथन; दृष्टः = उन-उन प्रकरणोंमे देखा गया है; तदुक्तम् = तथा यह पहले भी बताया जा चुका है । व्याख्या—जिस प्रकार उद्देश्यभेदसे की हुई भिन्न-भिन्न देवताओसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओंकी भिन्नता तथा उनका फलभेद होता है, उसी प्रकार इस एक उद्देश्यसे की जानेवाली ब्रह्मविद्यामे भी साधकोंकी भावना भिन्न-भिन्न होनेके कारण उपासनाके प्रकारमे और उसके फलमें भेद होना स्वाभाविक है । अभिप्राय यह कि सभी साधक एक ही प्रकारका भाव लेकर ब्रह्मप्राप्तिके साधनोंमे नहीं लगते, प्रत्येक साधककी भावनामे भेद रहता है । कोई साधक तो ऐसा होता है जो स्वभावसे ही समस्त भोगोंको दुःखप्रद और परिवर्तनशील समझकर उनसे विरक्त हो जाता है तथा परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कार होनेमे थोड़ा भी विलम्ब उसके लिये असह्य होता है । कोई साधक ऐसा होता है जो बुद्धिके विचारसे तो भोगोंको दुःखरूप समझता है, इसीलिये साधनमे भी लगा है, परन्तु ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाले भोग दुःखमे मिले हुए नहीं हैं, वहाँ केवल सुख-ही-सुख है तथा वहाँ जानेके बाद पुनरावृत्ति नहीं होती, सदाके लिये जन्म-मरणसे मुक्ति हो जाती है, इस भावनासे भावित है, परमात्माकी प्राप्ति तत्काल ही हो, ऐसी तीव्र लालसावाला नहीं है । इसी प्रकार साधकोंकी भावना अनेक प्रकारकी हो सकती है तथा उन भावनाओंके और योग्यताके भेदसे उनके अधिकारमें भी भेद होना स्वाभाविक है । इसलिये उन्हे बीचमें प्राप्त होनेवाले फलोंमे भेद होना सम्भव है । जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे सदाके लिये मुक्ति एव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्तिरूप जो चरम फल है, वह तो उन सबको यथा- समय प्राप्त होता ही है । साधकके भावानुबन्धसे फलमे भेद होनेकी बात उन-उन प्रकरणोंमें स्पष्टरूपसे उपलब्ध होती है । जैसे इन्द्र और विरोचन