भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ब्रह्माजीसे ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये गये। उनकी जो ब्रह्मविद्याके साधनमें प्रवृत्ति हुई, उसमें मुख्य कारण यह था कि उन्होंने ब्रह्माजीके मुखसे यह सुना कि उस परमात्माको जान लेनेवाला समस्त लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त हो जाता है। इस फलश्रुतिपर ही उनका मुख्य लक्ष्य था, इसीलिये विरोचन तो उस विद्याका अधिकारी न होनेके कारण उसमे टिक ही नहीं सका; परन्तु इन्द्रने उस विद्याको ग्रहण किया। फिर भी उसके मनमे प्रधानता उन लोकों और भोगोंकी ही थी, यह वहाँके प्रकरणमे स्पष्ट है (छा० उ० ८।७।३)। दहरविद्यामे भी उसी प्रकारसे ब्रह्मलोकके दिव्य भोगोंकी प्रशंसा है (छा० उ० ८।१।६)। अतः जिनके भीतर इन फलश्रुतियोंके आधारपर ब्रह्मलोकके भोग प्राप्त करनेका संकल्प है, उनको तत्काल ब्रह्मका साक्षात्कार कैसे हो सकता है? किन्तु जो भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस परब्रह्म परमात्माको साक्षात् करनेके लिये तत्पर है, उन्हें परमात्माकी प्राप्ति होनेमे विलम्ब नहीं हो सकता। शरीरके रहते-रहते यहीं परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। अतः भावनाके भेदसे भिन्न-भिन्न अधिकारियोको प्राप्त होनेवाले फलमे भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ३ । ३ । ५१ ॥ सामान्यात् = यद्यपि सभी ब्रह्मविद्या समानभावसे मोक्षमें हेतु है; अपि= तथापि; न=बीचमे होनेवाले फलभेदका निषेध नहीं है; हि=क्योंकि; उपलब्धेः= परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात्कार हो जानेपर; मृत्युवत् = जिस प्रकार मृत्यु होनेपर जीवात्माका स्थूल शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार उसका सूक्ष्म या कारण किसी भी शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये; लोकापत्तिः = किसी भी लोककी प्राप्ति; न=नहीं हो सकती। व्याख्या—सभी ब्रह्मविद्या अन्तमें मुक्ति देनेवाली हैं, इस विषयमे सबकी समानता है तो भी किसीका ब्रह्मलोकमे जाना और किसीका ब्रह्मलोकमें न जाकर यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाना तथा वहाँ जाकर भी किसीका प्रलयकालतक भोगोंके उपभोगका सुख अनुभव करना और किसीका तत्काल ब्रह्ममे लीन हो जाना— इत्यादिरूपसे जो फल-भेद हैं, वे उन साधकोके भावसे सम्बन्ध रखते हैं; इसलिये इस भेदका निषेध नहीं हो सकता।