भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ब्रह्माजीसे ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये गये। उनकी जो ब्रह्मविद्याके साधनमें प्रवृत्ति हुई, उसमें मुख्य कारण यह था कि उन्होंने ब्रह्माजीके मुखसे यह सुना कि उस परमात्माको जान लेनेवाला समस्त लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त हो जाता है। इस फलश्रुतिपर ही उनका मुख्य लक्ष्य था, इसीलिये विरोचन तो उस विद्याका अधिकारी न होनेके कारण उसमे टिक ही नहीं सका; परन्तु इन्द्रने उस विद्याको ग्रहण किया। फिर भी उसके मनमे प्रधानता उन लोकों और भोगोंकी ही थी, यह वहाँके प्रकरणमे स्पष्ट है (छा० उ० ८।७।३)। दहरविद्यामे भी उसी प्रकारसे ब्रह्मलोकके दिव्य भोगोंकी प्रशंसा है (छा० उ० ८।१।६)। अतः जिनके भीतर इन फलश्रुतियोंके आधारपर ब्रह्मलोकके भोग प्राप्त करनेका संकल्प है, उनको तत्काल ब्रह्मका साक्षात्कार कैसे हो सकता है? किन्तु जो भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस परब्रह्म परमात्माको साक्षात् करनेके लिये तत्पर है, उन्हें परमात्माकी प्राप्ति होनेमे विलम्ब नहीं हो सकता। शरीरके रहते-रहते यहीं परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। अतः भावनाके भेदसे भिन्न-भिन्न अधिकारियोको प्राप्त होनेवाले फलमे भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ३ । ३ । ५१ ॥ सामान्यात् = यद्यपि सभी ब्रह्मविद्या समानभावसे मोक्षमें हेतु है; अपि= तथापि; न=बीचमे होनेवाले फलभेदका निषेध नहीं है; हि=क्योंकि; उपलब्धेः= परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात्कार हो जानेपर; मृत्युवत् = जिस प्रकार मृत्यु होनेपर जीवात्माका स्थूल शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार उसका सूक्ष्म या कारण किसी भी शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये; लोकापत्तिः = किसी भी लोककी प्राप्ति; न=नहीं हो सकती। व्याख्या—सभी ब्रह्मविद्या अन्तमें मुक्ति देनेवाली हैं, इस विषयमे सबकी समानता है तो भी किसीका ब्रह्मलोकमे जाना और किसीका ब्रह्मलोकमें न जाकर यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाना तथा वहाँ जाकर भी किसीका प्रलयकालतक भोगोंके उपभोगका सुख अनुभव करना और किसीका तत्काल ब्रह्ममे लीन हो जाना— इत्यादिरूपसे जो फल-भेद हैं, वे उन साधकोके भावसे सम्बन्ध रखते हैं; इसलिये इस भेदका निषेध नहीं हो सकता।

सूत्र ५१-५२ ] अध्याय ३ २९३

सूत्र ५१-५२ ] अध्याय ३ २९३ अतएव जिस साधकको मृत्युके पहले कभी भी परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है, जो उस परमेश्वरके तत्त्वको भलीभाँति जान लेता है, जिसकी ब्रह्मलोक- पर्यन्त किसी भी लोकके सुख-भोगमे किञ्चिन्मात्र भी वासना नहीं रही है, वह किसी भी लोकविशेषमे नहीं जाता, वह तो तत्काल ही उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। (बृह० ३। ४। ४। ६ तथा क० उ० २। ३। १४) प्रारब्धभोगके अन्तमे उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरोके तत्त्व उसी प्रकार अपने-अपने कारण- तत्त्वोमे विलीन हो जाते हैं, जिस प्रकार मृत्युके बाद प्रत्येक मनुष्यके स्थूल शरीरके तत्त्व पाँचो भूतोमे विलीन हो जाते है (मु० उ० ३।२।७)। सम्बन्ध—ऐसा होनेमें क्या प्रमाण है ? इस जिज्ञासापर कहते है— परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनु- बन्धः ॥ ३ । ३ । ५२ ॥ परेण=बादवाले मन्त्रोसे (यह सिद्ध होता है); च=तथा; शब्दस्य= उसमे कहे हुए शब्दसमुदायका; ताद्विध्यम्=उसी प्रकारका भाव है; तु= किन्तु अन्य साधकोके; भूयस्त्वात्=दूसरे भावोकी अधिकतासे; अनुबन्धः= सूक्ष्म और कारणशरीरसे सम्बन्ध रहता है (इस कारण वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे पहले तो यह बात कही है कि— वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ 'वेदान्तशास्त्रके ज्ञानद्वारा जिन्होंने वेदान्तके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निश्चय कर लिया है, कर्मफलरूप समस्त भोगोके त्यागरूप योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक मरणकालमें ब्रह्म- लोकोंमें जाकर परम अमृतस्वरूप होकर सर्वथा मुक्त हो जाते हैं।' (३।२।६)। इसके बाद अगले मन्त्रमे, जिनको इस शरीरका नाश होनेसे पहले ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है, उनके विषयमे इस प्रकार कहा है— गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥

२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ 'उनकी पंद्रह कलाएँ अर्थात् प्राणोंके सहित सब इन्द्रियाँ अपने-अपने देवताओमे विलीन हो जाती है, जीवात्मा और उसके समस्त कर्मसंस्कार- ये सब-के-सब परम अविनाशी परमात्मामे एक हो जाते है।' ( ३ । २ । ७ )। फिर नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर बताया है कि 'तथा विद्वांनामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।'-'वह ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपको यहीं छोड़कर परात्पर ब्रह्ममें विलीन हो जाता है।' ( ३ । २ । ८ ) । इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले अधिकारियोके लिये ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतानेके बाद साक्षात् ब्रह्मको जान लेनेवाले विद्वान्‌का यहीं नाम-रूपसे मुक्त होकर परब्रह्ममे विलीन हो जाना सूचित करनेवाले शब्दसमुदाय पूर्वसूत्रमे कही हुई बातको स्पष्ट करते है । इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिनके अन्तःकरणमे ब्रह्मलोकके महत्त्वका भाव है, वहाँ जानेके सङ्कल्पसे जिनका सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ, ऐसे ही साधक ब्रह्मलोकोंमें जाते हैं। जिनको यहीं ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाता है, वे नहीं जाते । यह अवान्तर फल-भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध-यहाँतक मुक्तिविषयक फलभेदके प्रकरणको समाप्त करके अब शरीरपातके बाद आत्माकी सत्ता और कर्मफलका भोग न माननेवाले नास्तिकोंके मतका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३ । ३ । ५३ ॥ एके=कई एक कहते है कि; आत्मनः =आत्माका; शरीरे =शरीर होनेपर ही; भावात् =भाव होनेके कारण ( शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता नहीं है )। व्याख्या-कई एक नास्तिकोका कहना है कि जबतक शरीर है, तभीतक इसमे चेतन आत्माकी प्रतीति होती है, शरीरके अभावमे आत्मा प्रत्यक्ष नहीं है । इससे यही सिद्ध होता है कि शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है, अतएव मरनेके बाद, आत्मा परलोकमे जाकर कर्मोंका फल भोगता है या ब्रह्मलोकमे जाकर मुक्त हो जाता है, ये सभी बातें असङ्गत हैं । सम्बन्ध-इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं-- व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३ । ३ । ५४ ॥ व्यतिरेकः =शरीरसे आत्मा भिन्न है; तद्भावाभावित्वात् =क्योंकि शरीर रहते हुए भी उसमे आत्मा नहीं रहता, इसलिये; न =आत्मा शरीर नहीं है;

सूत्र ५३-५५ ] अध्याय ३ २९५

सूत्र ५३-५५ ] अध्याय ३ २९५ तु=किन्तु; उपलब्धिवत्=ज्ञातापनकी उपलब्धिके सदृश ( आत्माका शरीरसे भिन्न होना सिद्ध होता है )। व्याख्या—शरीर ही आत्मा है, यह बात ठीक नहीं है; किन्तु शरीरसे भिन्न, शरीर आदि समस्त भूतों और उनके कार्योंको जाननेवाला आत्मा अवश्य है; क्योंकि मृत्युकालमें शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है तो भी उसमे सब पदार्थोंको जाननेवाला चेतन आत्मा नहीं रहता । अतः जिस प्रकार यह प्रत्यक्ष है कि शरीरके रहते हुए भी उसमे जीवात्मा नहीं रहता, उसी प्रकार यह भी मान ही लेना चाहिये कि शरीरके न रहनेपर भी आत्मा रहता है, वह इस स्थूल शरीरमें नहीं तो अन्य ( सूक्ष्म ) शरीरमे रहता है; परन्तु आत्माका अभाव नहीं होता । अतः यह कहना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है कि इस स्थूल शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है। यदि इस शरीरसे भिन्न चेतन आत्मा नहीं होता तो वह अपने और दूसरोंके शरीरोको नहीं जान सकता; क्योंकि घटादि जड पदार्थोंमें एक- दूसरेको या अपने-आपको जाननेकी शक्ति नहीं है। जिस प्रकार सबका ज्ञाता होनेके कारण ज्ञातारूपमे आत्माकी उपलब्धि प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार शरीरका ज्ञाता होनेके कारण इस ज्ञेय शरीरसे उसका भिन्न होना भी प्रत्यक्ष है । सम्बन्ध—प्रसङ्गवश प्राप्त हुए नास्तिकवादका संक्षेपसे खण्डन करके, अब पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । जिज्ञासा यह है कि भिन्न-भिन्न शाखाओंमें यज्ञोंके उद्गीथ आदि अङ्गोंमें भेद है; अतः यज्ञादिके अङ्गोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना एक शाखा- मे कहे हुए प्रकारसे दूसरी शाखावालोंको करनी चाहिये या नहीं, इसपर कहते हैं— अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥ ३ । ३ । ५५ ॥ अङ्गावबद्धाः = यज्ञके उद्गीथ आदि अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासनाएँ; शाखासु हि=जिस शाखामें कही गयी हों, उसीमें करने योग्य हैं; न=ऐसी बात नहीं है; तु=किन्तु; प्रतिवेदम् = प्रत्येक वेदकी शाखावाले उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। व्याख्या—'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत'—'ॐ इस एक अक्षरकी उद्गीथके रूपमे उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० १ । १ । १ ), 'लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत'—'पाँच प्रकारके सामकी लोकोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर उपासना

२९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ करनी चाहिये।' (छा० उ० २ । २ । १)। इत्यादि प्रकारसे यज्ञादिके अङ्गरूप उद्गीथ आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली जो प्रतीकोपासना बतायी गयी है, उसका जिस शाखामें वर्णन है, उसी शाखावालोको उसका अनुष्ठान करना चाहिये, अन्य शाखावालोको नहीं करना चाहिये, ऐसी बात नहीं है; अपि तु प्रत्येक वेदकी शाखाके अनुयायी उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। सम्बन्ध—इसी बातको उदाहरणसे स्पष्ट करते हैं— मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ३ । ३ । ५६ ॥ वा=अथवा यो समझो कि; मन्त्रादिवत्=मन्त्र आदिकी भाँति; अविरोधः= इसमें कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार एक शाखामे बताये हुए मन्त्र और यज्ञोपयोगी अन्य पदार्थ, दूसरी शाखावाले भी आवश्यकतानुसार व्यवहारमें ला सकते हैं, उसमे किसी प्रकारका विरोध नहीं है; उसी प्रकार पूर्वसूत्रमे कही हुई यज्ञाङ्गोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओके अनुष्ठानमें भी कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—जिस प्रकार वैश्वानरविद्यामें एक-एक अङ्गकी उपासनाका वर्णन आता है, उसी प्रकार और भी कई जगह आता है, ऐसी उपासनाओंमे उनके एक-एक अङ्गकी अलग-अलग उपासना करनी चाहिये या सब अङ्गोंका समुच्चय करके एक साथ सबकी उपासना करनी चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥ ३ । ३ । ५७ ॥ क्रतुवत्=अङ्ग-उपाङ्गसे परिपूर्ण यज्ञकी भाँति; भूम्नः=पूर्ण उपासनाकी; ज्यायस्त्वम्=श्रेष्ठता है; हि=क्योंकि; तथा=वैसा ही कथन; दर्शयति=श्रुति दिखलाती है। व्याख्या—जिस प्रकार यज्ञके किसी अङ्गका अनुष्ठान करना और किसीका न करना श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु सर्वाङ्गपूर्ण अनुष्ठान ही श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वैश्वानरविद्या आदिमें बतायी हुई उपासनाका अनुष्ठान भी पूर्णरूपसे करना ही श्रेष्ठ है; उसके एक अङ्गका नहीं। वैश्वानर-विद्याकी भाँति सभी जगह यह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि श्रुतिने वैसा ही भाव वैश्वानर-विद्याके वर्णनमे दिखाया है। राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छहों ऋषियोंसे अलग- अलग पूछा कि 'तुम वैश्वानरकी किस प्रकार उपासना करते हो ?' उन्होंने अपनी- अपनी बात कही। राजाने एक-एक करके सबको बताया—'तुम अमुक

सूत्र ५६-५९ ] अध्याय ३ २९७

सूत्र ५६-५९ ] अध्याय ३ २९७ अङ्गकी उपासना करते हो।' साथ ही उन्होंने उस एकाङ्ग उपासनाका साधारण फल बताया और उन सबको भय दिखाते हुए कहा, 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा सिर गिर जाता, तुम अंधे हो जाते'-इत्यादि (छा० उ० ५ । ११ से १७ तक) । तदनन्तर (अठारहवे खण्डमे) यह बताया कि 'तुमलोग उस वैश्वानर परमात्माके एक-एक अङ्गकी उपासना करते हो, जो इस बातको समझकर आत्मारूपसे इसकी उपासना करता है, वह समस्त लोकमें, समस्त प्राणियोमे और समस्त आत्माओमे अन्न भक्षण करनेवाला हो जाता है।' (छा० उ० ५ । १८ । १) इस प्रकार वहाँ पूर्ण उपासनाका अधिक फल बताया गया है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि एक-एक अङ्गकी उपासनाकी अपेक्षा पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है। अतः पूर्ण उपासनाका ही अनुष्ठान करना चाहिये। सम्बन्ध-नाना प्रकारसे बतायी हुई ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न हे कि एक ही है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- नाना शब्दादिभेदात् ॥ ३ । ३ । ५८ ॥ शब्दादिभेदात्=शब्द आदिका भेद होनेके कारण; नाना=सब विद्याएँ अलग-अलग हैं। व्याख्या-सद्-विद्या, भूमविद्या, दहरविद्या, उपकोसलविद्या, शाण्डिल्यविद्या, वैश्वानरविद्या, आनन्दमयविद्या, अक्षरविद्या इत्यादि भिन्न-भिन्न नाम और विधि- विधानवाली इन विद्याओमे नाम और प्रकार आदिका भेद है। किसी अधिकारीके लिये एक विद्या उपयुक्त होती है, तो अन्यके लिये दूसरी ही उपयुक्त होती है; इसलिये सबका फल एक ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर भी विद्या एक नहीं है, भिन्न-भिन्न हैं। सम्बन्ध-इन सबके समुच्चयका विधान है या विकल्पका अर्थात् इन सबको मिलाकर अनुष्ठान करना चाहिये या एक-एकका अलग-अलग ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ३ । ३ । ५९ ॥ अविशिष्टफलत्वात्=सब विद्याओंका एक ही फल है, फलमें भेद नहीं है, इसलिये; विकल्पः=अलग-अलग अनुष्ठान करना ही उचित है। व्याख्या-जिस प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिके साधनभूत जो भिन्न-भिन्न यज्ञ-याग आदि बताये गये हैं, उनमेंसे जिन-जिनका फल एक है, उनका समुच्चय नहीं होता। यजमान अपने इच्छानुसार उनमेसे किसी भी एक यज्ञका अनुष्ठान कर सकता है।

२९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इसी प्रकार उपर्युक्त विद्याओंका ब्रह्मसाक्षात्काररूप एक ही फल होनेके कारण उनके समुच्चयकी आवश्यकता नहीं है। साधक अपनी रुचिके अनुकूल किसी एक विद्याके अनुसार ही साधन कर सकता है। सम्बन्ध-जो सकाम उपासनाएँ अलग-अलग फलके लिये बतायी गयी है, उनका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ ३।३।६० ॥ काम्याः=सकाम उपासनाओका अनुष्ठान; तु=तो; यथाकामम्=अपनी- अपनी कामनाके अनुसार; समुच्चीयेरन्=समुच्चय करके किया करे; वा= अथवा; न=समुच्चय न करके अलग-अलग करें; पूर्वहेत्वभावात्=क्योंकि इनमें पूर्वोक्त हेतु ( फलकी समानता ) का अभाव है। व्याख्या—सकाम उपासनाओंमें सबका एक फल नहीं बताया गया है, भिन्न- भिन्न उपासनाका भिन्न-भिन्न फल कहा गया है, इस प्रकार पूर्वोक्त हेतु न होनेके कारण सकाम उपासनाका अनुष्ठान अधिकारी अपनी कामनाके अनुसार जिस प्रकार आवश्यक समझे, कर सकता है। जिन-जिन भोगोंकी कामना हो, उन- उनके लिये बतायी हुई सब उपासनाओका समुच्चय करके भी कर सकता है और अलग-अलग भी कर सकता है, इसमें कोई अड़चन नहीं है। सम्बन्ध-अब उद्गीथ आदि अङ्गोंमें की जानेवाली उपासनाके विषयमें विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। पहले चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है— अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ३ । ३ । ६१ ॥ अङ्गेषु=भिन्न-भिन्न अङ्गोंमें (की जानेवाली उपासनाओंका);यथाश्रयभावः= यथाश्रय भाव है अर्थात् जो उपासना जिस अङ्गके आश्रित है, उस अङ्गके अनुसार ही-उस उपासनाका भी भाव समझ लेना चाहिये। व्याख्या-यज्ञकर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमे की जानेवाली जो उपासनाएँ है, जिनका दिग्दर्शन पचपनवें सूत्रमे किया गया है, उनमेसे जो उपासना जिस अङ्गके आश्रित है, उस आश्रयके अनुसार ही उसकी व्यवस्था करनी चाहिये। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जिन-जिन कर्मोंके अङ्गोका समुच्चय हो सकता है,उन- उन अङ्गोंमें की जानेवाली उपासनाओंका भी उन कर्मोंके साथ समुच्चय हो सकता है।

सूत्र ६०—६४ ] अध्याय ३ २९९

सूत्र ६०—६४ ] अध्याय ३ २९९ सम्बन्ध—इसके सिवा— शिष्टेश्च ॥ ३ । ३ । ६२ ॥ शिष्टेः=श्रुतिके शासन ( विधान ) से; च=भी ( यही सिद्ध होता है ) । व्याख्या—जिस प्रकार उद्गीथ आदि स्तोत्रोंके समुच्चयका श्रुतिमे विधान है, उसी प्रकार उनके आश्रित उपासनाओंके समुच्चयका विधान भी उनके साथ ही हो जाता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि कर्मोंके अङ्गोंके अनुसार उनके आश्रित रहनेवाली उपासनाओका समुच्चय हो सकता है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको दृढ करते हैं— समाहारात् ॥ ३ । ३ । ६३ ॥ समाहारात्=कर्मोंका समाहार वताया गया है, इसलिये उनके आश्रित उपासनाओका भी समाहार ( समुच्चय ) उचित ही है । व्याख्या—उद्गीथ उपासनामे कहा है कि 'स्तोत्रगान करनेवाला पुरुष होताके कर्ममे जो स्तोत्रसम्बन्धी त्रुटि हो जाती है, उसका भी संशोधन कर लेता है।' ( छा० उ० १ । ५ । ५ ) । इस प्रकार प्रणव और उद्गीथकी एकता समझकर उद्गान करनेका महत्त्व दिखाया है । इस समाहारसे भी अङ्गाश्रित उपासनाका समुच्चय सूचित होता है । सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ॥ ३ । ३ । ६४ ॥ गुणसाधारण्यश्रुतेः=गुणोंकी साधारणता बतानेवाली श्रुतिसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—उपासनाका गुण जो ॐकार है, उसका प्रयोग समान भावसे दिखाया है । जैसे कहा है कि 'उस ( ॐ ) अक्षरसे ही यह त्रयीविद्या (तीनो वेदोसे सम्बन्ध रखनेवाली यज्ञादि कर्मसम्बन्धी विद्या ) प्रवृत्त होती है, ॐ ऐसा कहकर ही आश्रावण कर्म करता है, ॐ ऐसा कहकर होता ( कथन ) करता है, ॐ ऐसा कहकर ही उद्गाता स्तोत्रगान करता है ।' (छा० उ० १ । १ । ९) इसी प्रकार कर्माङ्ग-सम्बन्धी गुण जो कि उद्गीथ आदि है, उनका भी समान भावसे प्रयोग श्रुतिमे विहित है । इसलिये भी उपासनाओंका उनके आश्रयभूत कर्माङ्गोंके साथ समुच्चय होना उचित सिद्ध होता है ।

सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है—

३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध-इस प्रकार चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है— न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३ । ३ । ६५ ॥ वा=किन्तु; तत्सहभावाश्रुतेः=उन-उन उपासनाओंका समुच्चय बतानेवाली श्रुति नहीं है, इसलिये; न= उपासनाओका समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—उन-उन उपासनाओके आश्रयभूत जो उद्गीथ आदि अङ्ग हैं, उन अङ्गोके समाहारकी भाँति उनके साथ उपासनाओका समाहार बतानेवाली कोई श्रुति नहीं है, इसलिये यह सिद्ध नहीं हो सकता कि उन-उन आश्रयोंके समुच्चयकी भाँति ही उपासनाओंका भी समुच्चय होना चाहिये; क्योकि उपासनाओका उद्देश्य भिन्न है, जिस उद्देश्यसे जिस फलके लिये यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, उनके अङ्गोमें की जानेवाली उपासना उनसे भिन्न उद्देश्यसे की जाती है, अतः अङ्गोंके साथ उपासनाके समुच्चयका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उपासनाओंका समुच्चय नहीं बन सकता, उनका अनुष्ठान अलग-अलग ही करना चाहिये। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ६६ ॥ दर्शनात्=श्रुतिमे उपासनाओंका समाहार न करना दिखाया गया है, इसलिये; च=भी ( उनका समाहार सिद्ध नहीं हो सकता )। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'पूर्वोक्त प्रकारसे रहस्यको जाननेवाला ब्रह्मा निःसन्देह यज्ञकी, यजमानकी और अन्य ऋत्विजोकी रक्षा करता है।' (छा० उ० ४ । १७ । १०) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याकी महिमाका वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि इन उपासनाओंका कर्मके साथ समुच्चय नहीं होता है; क्योकि यदि उपासनाओंका सर्वत्र समाहार होता तो दूसरे ऋत्विक् भी उस तत्त्वके ज्ञाता होते और स्वयं ही अपनी रक्षा करते, ब्रह्माको उनकी रक्षा करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे यही सिद्ध होता है कि उपासनाएँ उनके आश्रयभूत कर्मसम्बन्धी अङ्गोके अधीन नहीं हैं, स्वतन्त्र हैं, अतएव समुच्चय न करके उनका अनुष्ठान अलग ही करना चाहिये। तीसरा पाद सम्पूर्ण।

चौथा पाद तीसरे पादमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायभूत भिन्न-भिन्न विद्याओंके विषयमें प्रतीत होनेवाले विरोधको दूर किया गया तथा उन विद्याओंमेंसे किस विद्याके कौन-से गुण दूसरी विद्यामें ग्रहण किये जा सकते हैं, कौन-से नहीं किये जा सकते ? इन विद्याओंका अलग-अलग अनुष्ठान करना उचित है या इनमेंसे कुछका समुच्चय भी किया जा सकता है ? इत्यादि विषयोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया । अब ब्रह्मज्ञान परमात्माकी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है या नही ? उसके अन्तरङ्ग साधन कौन-से हैं और बहिरङ्ग कौन-से हैं ? इन सब बातोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है । यहाँ पहले परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थकी सिद्धि केवल ज्ञानसे ही होती है या कर्मादिके समुच्चयसे ? इसपर विचार आरम्भ करनेके लिये वेदव्यासजी अपना निश्चित मत बतलाते हैं-- पुरुषार्थोऽतःशब्दादिति बादरायणः ॥ ३ । ४ । १ ॥ पुरुषार्थः=परब्रह्मकी प्राप्ति; अतः=इससे अर्थात् ब्रह्मज्ञानसे होती है; शब्दात्=क्योंकि शब्द ( श्रुतिके वचन ) से यही सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः=बादरायण कहते हैं । व्याख्या--वेदव्यासजी महाराज सबसे पहले अपना मत बतलाते हैं कि ‘तरति शोकमात्मवित्’— आत्मज्ञानी शोक-मोहसे तर जाता है ( छा० उ० ७ । १ । ३ ); ‘तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।’—ज्ञानी महात्मा नामरूपसे मुक्त होनेपर परात्पर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ( मु० उ० ३ । २ । ८ ), ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’—‘ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त हो जाता है’ ( तै० उ० २ । १ ), ‘ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।’— ‘परम देवको जानकर सब प्रकारके पाशों ( बन्धनों ) से मुक्त हो जाता है’ ( श्वेता० उ० ५ । १३ ) । इस प्रकार श्रुतिका कथन होनेसे यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि इस ब्रह्मज्ञानसे ही होती है ।

३०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—उपर्युक्त सिद्धान्तसे जैमिनि ऋषिका मतभेद दिखाते हुए कहते हैं— शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनिः ॥ ३ । ४ । २ ॥ शेषत्वात् = कर्मका अङ्ग होनेके कारण; पुरुषार्थवादः = ब्रह्मविद्याको पुरुषार्थ- का हेतु बताना अर्थवादमात्र है; यथा = जिस प्रकार; अन्येषु = यज्ञके दूसरे अङ्गोंमे फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है; इति = यह; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य कहते हैं । व्याख्या—आचार्य जैमिनि यह मानते हैं कि आत्मा कर्मका कर्ता होनेसे उसके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विद्या भी कर्मका अङ्ग है; इसलिये उसे पुरुषार्थ- का साधन बताना उसकी प्रशंसा करना है । पुरुषार्थका साधन तो वास्तवमे कर्म ही है । जिस प्रकार कर्मके दूसरे अङ्गोंकी फलश्रुति उनकी प्रशंसामात्र समझी जाती है, वैसे ही इसे भी समझना चाहिये । सम्बन्ध—विद्या कर्मका अङ्ग है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये कारण बतलाते हैं— आचारदर्शनात् ॥ ३ । ४ । ३ ॥ आचारदर्शनात् = श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अङ्ग है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि 'राजा जनकने एक समय बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया और उसमे कुरु तथा पाञ्चालदेशके बहुत-से ब्राह्मण एकत्र हुए थे।' इत्यादि (बृह० उ० ३ । १ । १) छान्दोग्यमें वर्णन आया है कि राजा अश्वपतिने अपने पास ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये आये हुए ऋषियोंसे कहा— 'आपलोग सुने, मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कंजूस है, न मद्य पीनेवाला है, न अग्निहोत्र न करनेवाला है और न कोई विद्याहीन है । यहाँ कोई परस्त्रीगामी पुरुष ही नहीं है; फिर कुलटा स्त्री कैसे रह सकती है ?* हे पूज्यगण ! मैं अभी यज्ञ करनेवाला हूँ । एक-एक ऋत्विजको जितना धन दूँगा, उतना ही

  • न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः । नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥

सूत्र २–६ ] अध्याय ३ ३०३

सूत्र २–६ ] अध्याय ३ ३०३ आपलोगोको भी दूँगा, आप यहीं ठहरिये ।' ( छा० उ० ५ । ११ । ५ ) महर्षि उद्दालक भी यज्ञकर्म करनेवाले थे, जिन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतुको ब्रह्म- विद्याका उपदेश दिया था । ( छा० उ० छठा अध्याय पूरा ) याज्ञवल्क्य भी जो ब्रह्मवादियोमे सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं, गृहस्थ और कर्म करनेवाले थे । इस प्रकार श्रुतिमे वर्णित श्रेष्ठ पुरुषोका आचरण देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका ही अङ्ग है और कर्मोंके सहित ही वह पुरुषार्थका साधन है । सम्बन्ध—इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ करते हैं— तच्छ्रुतेः ॥ ३ । ४ । ४ ॥ तच्छ्रुतेः = तद्विषयक श्रुतिमे भी यही बात सिद्ध होती है । व्याख्या—श्रुतिका कथन है कि 'जो ॐकाररूप अक्षरके तत्त्वको जानता है और जो नहीं जानता, वे दोनो ही कर्म करते हैं, परन्तु जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है, वही प्रबल्तर होता है ।' ( छा० उ० १ । १ । १० ) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याको कर्मका अङ्ग बतलाया है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है । सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ करनेके लिये प्रमाण देते हैं— समन्वारम्भणात् ॥ ३ । ४ । ५ ॥ समन्वारम्भणात् = विद्या और कर्म दोनो जीवात्माके साथ जाते हैं, यह कथन होनेके कारण ( भी ) यही बात सिद्ध होती है । व्याख्या—जब आत्मा शरीरसे निकलकर जाता है, तब उसके साथ प्राण, अन्तःकरण और इन्द्रियाँ तो जाती ही हैं, विद्या और कर्म भी जाते हैं ( बृह० उ० ४ । ४ । २ ) । इस प्रकार विद्या और कर्म दोनोके सस्कारोको साथ लेकर जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमे गमन बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मका ही अङ्ग है । सम्बन्ध—फिर दूसरे प्रमाणसे भी इसी बातको सिद्ध करते हैं— तद्वतो विधानात् ॥ ३ । ४ । ६ ॥ तद्वतः = आत्मज्ञानयुक्त अधिकारीके लिये; विधानात् = कर्मोंका विधान होनेके कारण भी ( यही सिद्ध होता है ) ।

३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—श्रुतिने ब्रह्मविद्याकी परम्पराका वर्णन करते हुए कहा है कि 'उस ब्रह्मज्ञानका उपदेश ब्रह्माने प्रजापतिको दिया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । ब्रह्मचारी नियमानुसार गुरुकी सेवा आदि कर्तव्य कर्मोंका भलीभाँति अनुष्ठान करते हुए वेदका अध्ययन समाप्त करे, फिर आचार्यकुलसे समावर्तनसंस्कारपूर्वक स्नातक बनकर लौटे और कुटुम्बमे रहता हुआ पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता रहे । पुत्र और शिष्यादिको धार्मिक बनाकर समस्त इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित करे।' इन सब नियमोंको बताकर उनके फलका इस तरह वर्णन किया है—'इस प्रकार आचरण करनेवाला मनुष्य अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८ । १५ । १) । इस तरह विद्यापूर्वक कर्म करनेके विधानसे यह बात सिद्ध होती है कि विद्या कर्मका अङ्ग है । सम्बन्ध—इतना ही नहीं; अपि तु— नियमाच्च ॥ ३ । ४ । ७ ॥ नियमात्=श्रुतिमे नियमित किया जानेके कारण; च=भी (कर्म अवश्य कर्तव्य है, अतः विद्या कर्मका अङ्ग है, यह सिद्ध होता है) । व्याख्या—श्रुतिका आदेश है कि 'मनुष्य शास्त्रविहित श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए ही इस जगत्मे सौ वर्षोंतक जीवित रहनेकी इच्छा करे । इस प्रकार जीवनयात्राका निर्वाह करनेपर तुझ मनुष्यमे कर्म लिप्त नहीं होंगे । इसके सिवा दूसरे प्रकारका ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे कर्म लिप्त न होवे ।' (ईशा० २) इस प्रकार आजीवन कर्मानुष्ठानका नियम होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है । सम्बन्ध—इस प्रकार जैमिनिके मतका वर्णन करके सूत्रकार अपने सिद्धान्त- को सिद्ध करनेके लिये उत्तर देते हैं— अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ८ ॥ तु=किन्तु; अधिकोपदेशात्=श्रुतिमें कर्मोंकी अपेक्षा अधिक ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका कथन होनेके कारण; बादरायणस्य=व्यासजीका मत; एवं=जैसा प्रथम सूत्रमें कहा था वैसा ही है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिमें विद्याकी अधिकता दिखलायी गयी है ।

सूत्र ७-८ ] अध्याय ३ ३०५

सूत्र ७-८ ] अध्याय ३ ३०५ व्याख्या-जैमिनिने जो विद्याको कर्मका अङ्ग बताया है, वह ठीक नहीं है। उन्होंने अपने कथनकी सिद्धिके लिये जो युक्तियाँ दी है, वे भी आभासमात्र ही है। अतः बादरायणने पूर्वसूत्रमे जो अपना मत प्रकट किया है, वह अब भी ज्यों-का-त्यों है। जैमिनिकी युक्तियोंसे उसमे कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यद्यपि ब्रह्मज्ञानके साथ-साथ लोकसंग्रहके लिये या प्रारब्धानुसार शरीरस्थितिके निमित्त किये जानेवाले कर्म रहें, तो उनसे कोई हानि नहीं है; तथापि परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थका कारण तो एकमात्र परमात्माका तत्त्वज्ञान ही है। इसके सिवा, न तो कर्म-ज्ञानका समुच्चय परमपुरुषार्थका साधन है और न केवल कर्म ही; क्योकि श्रुतिमे कहा है- इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ 'इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही श्रेष्ठ माननेवाले मूर्खलोग उससे भिन्न वास्तविक श्रेयको नहीं जानते। वे शुभ कर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकके उच्चतम स्थानमे वहाँके भोगोका अनुभव करके इस मनुष्यलोकमें या इससे भी अत्यन्त नीचेके लोकमे गिरते हैं।' (मु० उ० १ । २ । १०) परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ 'इस प्रकार कर्मसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी परीक्षा करके अर्थात् उनकी अनित्यताको समझकर द्विजको उनसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये तथा यह निश्चय करना चाहिये कि वह अमृत अर्थात् स्वतःसिद्ध परमात्मा कर्मोंके द्वारा नहीं मिल सकता। अतः जिज्ञासु पुरुष उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरुके समीप हाथमें समिधा लिये हुए जाय ।' (मु० उ० १ । २ । १२) 'इस तरह अपनी शरणमे आये हुए शिष्यको ब्रह्मज्ञानी महात्मा ब्रह्मविद्याका उपदेश करे ।' (मु० उ० १ । २ । १३) । यह सब कहकर श्रुतिने वहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया है और उसे ज्ञानके द्वारा प्राप्त होने योग्य बतलाकर (मु० उ० २ । २ । ७) कहा है कि 'कार्य-कारणस्वरूप उस ब्रह्मको जान लेनेपर इस मनुष्यके हृदयकी चिज्जड-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है, सब संशय नष्ट हो जाते हैं और समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है।' (मु० उ० २ । २ । ८) । इस प्रकार श्रुतियोमे जगह-जगह कर्मोंकी अपेक्षा ब्रह्मज्ञानका महत्त्व बहुत अधिक बताया गया है। इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है। वे० द० २०-

३०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध-श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे जो विद्याको कर्मका अङ्ग बताया गया था, उसका उत्तर देते हैं— तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ३ । ४ । ९ ॥ दर्शनम् = आचारका दर्शन; तु = तो; तुल्यम् = समान है (अतः उससे विद्या कर्मका अङ्ग है, यह नहीं सिद्ध होता)। व्याख्या-आचारसे भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अङ्ग है; क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारका आचार देखा जाता है। एक ओर ज्ञाननिष्ठ जनकादि गृहस्थ महापुरुष लोकसंग्रहके लिये यज्ञ-यागादि कर्म करते देखे जाते हैं तो दूसरी ओर केवल भिक्षासे निर्वाह करनेवाले विरक्त संन्यासी महात्मा लोकसंग्रहके लिये ही समस्त कर्मोंका त्याग करके ज्ञाननिष्ठ हो केवल ब्रह्मचिन्तनमे रत रहते हैं। इस प्रकार आचार तो दोनों ही तरहके उपलब्ध होते हैं। इससे कर्मकी प्रधानता नहीं सिद्ध होती है। जिनको वास्तवमे ज्ञान प्राप्त हो गया है, उनको न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न उसके त्यागसे ही (गीता ३ । १७)। अतएव प्रारब्ध तथा ईश्वरके विधानानुसार उनका आचरण दोनों प्रकारका ही होता है। इसके सिवा श्रुतिमे यह भी कहा है कि 'इसलिये पूर्वके विद्वानोंने अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया' (कौ० उ० २ । ५) 'इस आत्माको जानकर ही ब्राह्मणलोग पुत्रादिकी इच्छाका त्याग करके विरक्त हो भिक्षासे निर्वाह करते हुए विचरते हैं' (बृह०उ० ३।५।१)। याज्ञवल्क्यने भी दूसरोंमे वैराग्यकी भावना उत्पन्न करनेके लिये अन्तमें संन्यास ग्रहण किया (बृह०उ० ४ । ५ । १५)। इस प्रकार श्रुतियोमे कर्म-त्यागके आचारका भी जगह-जगह वर्णन पाया जाता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमपुरुषार्थका हेतु केवल ब्रह्मज्ञान ही है और वह कर्मका अङ्ग नहीं है। सम्बन्ध-पूर्वपक्षकी ओरसे जो श्रुतिका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— असार्वत्रिकी ॥ ३ । ४ । १० ॥ असार्वत्रिकी=(वह श्रुति) एकदेशीय है—सर्वत्र सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है।

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७ व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो 'यदेव विद्यया करोति' (छा० उ० १ । १ । १०) इत्यादि श्रुतिका प्रमाण दिया है, वह एकदेशीय है। उस प्रकरणमे आयी हुई उद्गीथ-विद्यासे ही उसका सम्बन्ध है, अतः उसको ही वह कर्मका अङ्ग बताती हैं; अन्य सब प्रकरणोंमें वर्णित समस्त विद्याओसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः उस एकदेशीय श्रुतिमे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि विद्यामात्र कर्मका अङ्ग है। सम्बन्ध—पांचवें सूत्रमे पूर्वपक्षीने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके विषयमे उत्तर देते हैं— विभागः शतवत् ॥ ३ । ४ । ११ ॥ शतवत्=एक सौ मुद्राके विभागकी भाँति; विभागः=उस श्रुतिमें कहे हुए विद्या-कर्मका विभाग अधिकारिभेदसे समझना चाहिये। व्याख्या—जिस प्रकार किसीको आज्ञा दी जाय कि 'एक सौ मुद्रा उपस्थित लोगोंको दे दो।' तो सुननेवाला पुरुष पानेवाले लोगोंके अधिकारके अनुसार विभाग करके उन मुद्राओंका वितरण करेगा। उसी प्रकार इस श्रुतिके कथनका भाव भी अधिकारीके अनुसार विभागपूर्वक समझना चाहिये। जो ब्रह्मज्ञानी है, उसके कर्म तो यहां नष्ट हो जाते हैं। अत वह केवल विद्याके बलसे ही ब्रह्मलोकको जाता है। उसके साथ कर्म नहीं जाते (मु० उ० १ । २ । ११ ) और जो सांसारिक मनुष्य हैं या साधनभ्रष्ट है, उनके साथ विद्या और कर्म दोनोंके ही मस्कार जाते हैं। वहाँ विद्याका अर्थ परमात्माका अपरोक्षज्ञान नहीं; किन्तु केवल श्रवण, मनन आदिका अभ्यास समझना चाहिये। अत इससे भी विद्या कर्मका अङ्ग हैं, यह सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसं जो छठे सूत्रमें प्रजापतिके वचनोका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— अध्ययनमात्रवतः ॥ ३ । ४ । १२ ॥ अध्ययनमात्रवतः = जिसने विद्याका केवल अध्ययनमात्र किया है, अनुष्ठान नहीं, ऐसे विद्वान्‌के विषयमें यह कथन है। व्याख्या—प्रजापतिके उपदेशमे जो विद्यासम्पन्न पुरुषके लिये कुटुम्बमे जाने और कर्म करनेकी बात कही गयी हैं, वह कथन गुरुकुलसे अध्ययनमात्र करके

३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ निकलनेवाले ब्रह्मचारीके लिये है। अतः जिसने ब्रह्मविद्याका केवल अध्ययन किया है, मनन और निदिध्यासनपूर्वक उसका अनुष्ठान नहीं किया, ऐसे अधिकारीके प्रति अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मोंका विधान है, जो कि सर्वथा उचित है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग है। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे जो अन्तिम श्रुति-प्रमाण दिया गया है, उसका उत्तर चार सूत्रोंमें अनेक प्रकारसे देते हैं— नाविशेषात् ॥ ३ । ४ । १३ ॥ अविशेषात् = वह श्रुति विशेषरूपसे विद्वान्के लिये नहीं कही गयी है, इसलिये; न = ज्ञानके साथ उसका समुच्चय नहीं है। व्याख्या—वहाँ जो त्यागपूर्वक आजीवन कर्म करनेके लिये कहा है, वह कथन सभी साधकोंके लिये समानभावसे है; ज्ञानीके लिये विशेषरूपसे नहीं है। अतः उससे न तो यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका अङ्ग है और न यही सिद्ध होता है कि केवल ब्रह्मविद्यासे परम पुरुषार्थ प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध—यदि उस श्रुतिको समानभावसे सबके लिये मान लिया जाय तो फिर उसके द्वारा ज्ञानीके लिये भी तो कर्मका विधान हो ही जाता है, इसपर कहते हैं— स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३ । ४ । १४ ॥ वा = अथवा यों समझो कि; स्तुतये = विद्याकी स्तुतिके लिये; अनुमतिः = सम्मतिमात्र है। व्याख्या = यदि इस श्रुतिको समानभावसे ज्ञानीके लिये भी माना जाय तो उसका यह भाव समझना चाहिये कि ज्ञानी लोकसंग्रहार्थ आजीवन कर्म करता रहे तो भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसमे कर्म लिप्त नहीं होते। वह उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित रहता है। इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा करनेके लिये यह श्रुति कर्म करनेकी सम्मतिमात्र देती है, उसे कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती; अतः यह श्रुति विद्याको कर्मोंका अङ्ग बतलानेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— कामकारेण चैके ॥ ३ । ४ । १५ ॥

सूत्र १३—१७] अध्याय ३ ३०९

सूत्र १३—१७] अध्याय ३ ३०९ च = इसके सिवा; एके = कई एक विद्वान्; कामकारेण = स्वेच्छापूर्वक (कर्मोंका त्याग कर देते हैं, इसलिये भी विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है)। व्याख्या-श्रुति कहती है कि 'किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः ।'—'हम प्रजासे क्या प्रयोजन सिद्ध करेंगे, जिनका यह परब्रह्म परमेश्वर ही लोक अर्थात् निवासस्थान है।' (बृह० उ० ४ । ४ । २२) इत्यादि श्रुतियो- में कितने ही विद्वानोंका स्वेच्छापूर्वक गृहस्थ आश्रम और कर्मोंका त्याग करना बतलाया गया है। यदि 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि श्रुति सभी विद्वानोंके लिये कर्मका विधान करनेवाली मान ली जाय तो इस श्रुतिसे विरोध आयेगा। अतः यही समझना चाहिये कि विद्वानोमे कोई अपनी पूर्वप्रकृतिके अनुसार आजीवन कर्म करता रहता है और कोई छोड़ देता है, इसमे उनकी स्वतन्त्रता है। इसलिये भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अङ्ग है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— उपमर्दं च ॥ ३ । ४ । १६ ॥ च=इसके सिवा; उपमर्दम्=ब्रह्मविद्यासे कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाना कहा है (इससे भी पूर्वोक्त बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-'उस परमात्माका ज्ञान हो जानेपर इसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते है' (मु० उ० २ । २ । ८) इत्यादि श्रुतियोंमें तथा स्मृतिमें भी ज्ञानका फल समस्त कर्मोंका भलीभाँति नाश बतलाया है (गीता ४ । ३७)*। इसलिये ब्रह्मविद्या- को कर्मका अङ्ग नहीं माना जा सकता; तथा केवल ब्रह्मविद्यासे परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती, यह कहना भी नहीं बन सकता। सम्बन्ध-पुनः दूसरे प्रमाणसे सिद्धान्तकी पुष्टि करके यहाँतक जैमिनिद्वारा उपस्थित की हुई सब शङ्काओंका उत्तर देकर 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है, स्वतन्त्र साधन है।' इस बातकी पुनः पुष्टि करते हैं— ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ॥ ३ । ४ । १७ ॥

  • यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥ 'हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित आग लकड़ियोंको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।'

३१० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऊर्ध्वरेतस्सु = जिनमें वीर्यको सुरक्षित रखनेका विधान है, ऐसे तीन आश्रमोंमें; च = भी ( ब्रह्मविद्याका अधिकार है ); हि = क्योंकि; शब्दे = वेदमें ऐसा कहा है ( इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है )। व्याख्या—जैसे गृहस्थ-आश्रममें ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानका अधिकार है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन तीनों आश्रमोंमें भी उसके अनुष्ठानका अधिकार है; क्योंकि वेदमें ऐसा ही वर्णन है। मुण्डकोपनिषद् ( १ । २ । ११ ) मे कहा है कि— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ 'जो वनमें रहनेवाले ( वानप्रस्थ ), शान्त स्वभाववाले विद्वान् गृहस्थ तथा भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी और संन्यासी तप एवं श्रद्धाका सेवन करते हैं, वे रजोगुणसे रहित साधक सूर्यके मार्गसे वहाँ चले जाते हैं, जहाँ जन्म-मृत्युसे रहित नित्य अविनाशी परम पुरुष निवास करता है।' इसके सिवा, अन्य श्रुतियोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। (प्र० उ० १ । १०) इससे यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है; क्योंकि संन्यासीके लिये वैदिक यज्ञादि कर्मोंका विधान नहीं है और उनका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। यदि ब्रह्मविद्याको कर्मका अङ्ग मान लिया जाय तो संन्यासीके द्वारा उसका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा ? सम्बन्ध—अब जैमिनिकी ओरसे पुनः शङ्का उपस्थित की जाती है— परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि ॥ ३ । ४ । १८ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि; परामर्शम् = उक्त श्रुतिमें संन्यास-आश्रमका अनुवादमात्र मानते हैं, विधि नहीं; हि = क्योंकि; अचोदना = उसमें विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है; च = इसके सिवा; अपवदति = श्रुति संन्यासका अपवाद ( निषेध ) भी करती है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि संन्यास-आश्रम अनुष्ठेय ( पालन करनेयोग्य ) नहीं है। गृहस्थ-आश्रममें रहकर कर्मानुष्ठान करते हुए ही मनुष्यका परमपुरुषार्थ सिद्ध हो सकता है। पूर्वोक्त श्रुतिमें 'भैक्ष्यचर्यां चरन्तः' इन पदोंके द्वारा संन्यासका अनुवादमात्र ही हुआ है, विधि नहीं है; क्योंकि वहाँ विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है। इसके सिवा, श्रुतिने स्पष्ट शब्दोंमें

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११ संन्यासका निषेध भी किया है। जैसे—'जो अग्निहोत्रका त्याग करता है, वह देवोंके वीरोंको मारनेवाला है' (तै० सं० १ । ५ । २ । १)। 'आचार्यको उनकी इच्छाके अनुरूप धन दक्षिणामें देकर संतान-परम्पराको बनाये रक्खो, उसका उच्छेद न करो।' (तै० उ० १ । ११) । इन वचनोंद्वारा संन्यास- आश्रमका प्रतिवाद होनेसे यही सिद्ध होता है कि संन्यास-आश्रम आचरणमें लाने- योग्य नहीं है। अतएव संन्यासीका ब्रह्मविद्यामें अधिकार बताकर यह कहना कि 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है।' ठीक नहीं है। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं— अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥ ३ । ४ । १९ ॥ बादरायणः = व्यासदेव कहते हैं कि; अनुष्ठेयम् = गृहस्थकी ही भाँति अन्य आश्रमोंके धर्मोंका अनुष्ठान भी कर्तव्य है; साम्यश्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें समस्त आश्रमोंकी और उनके धर्मोंकी कर्तव्यताका समानरूपसे प्रतिपादन किया गया है। व्याख्या—जैमिनिके उक्त कथनका उत्तर देते हुए वेदव्यासजी कहते हैं— उक्त श्रुतिमें चारों आश्रमोंका अनुवाद है; परन्तु अनुवाद भी उसीका होता है, जो अन्यत्र विहित हो। दूसरी-दूसरी श्रुतियोंमें जैसे गृहस्थ-आश्रमका विधान प्राप्त होता है, उसी प्रकार अन्य आश्रमोंका विधान भी उपलब्ध होता है, इसमें कोई अन्तर नहीं है। अतः जिस प्रकार गृहस्थ-आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान उचित है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यासके धर्मोंका भी अनुष्ठान करना चाहिये। पूर्वपक्षीने जिन श्रुतियोंके द्वारा संन्यासका निषेध सूचित किया है, उनका तात्पर्य दूसरा ही है। वहाँ अग्निहोत्रका त्याग न करनेपर जोर दिया गया है। यह बात उन्हीं लोगोंपर लागू होती है, जो उसके अधिकारी हैं। गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रममें रहते हुए कभी अग्निहोत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। यही बताना श्रुतिको अभीष्ट है। इसी प्रकार संतानपरम्पराका उच्छेद न करनेका आदेश भी उन्हींके लिये है, जो पूर्णतः विरक्त नहीं हुए है। विरक्तके लिये तो तत्काल संन्यास लेनेका विधान श्रुतिमें स्पष्ट देखा जाता है। यथा 'यदहरेव विरजेत्तद- हरेव प्रव्रजेत्।' अर्थात् 'जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन संन्यास ले ले।' अतः संन्यासीका भी ब्रह्मविद्यामे अधिकार होनेके कारण विद्याको कर्मका अङ्ग न मानना ही ठीक है।