भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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३०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—उपर्युक्त सिद्धान्तसे जैमिनि ऋषिका मतभेद दिखाते हुए कहते हैं— शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनिः ॥ ३ । ४ । २ ॥ शेषत्वात् = कर्मका अङ्ग होनेके कारण; पुरुषार्थवादः = ब्रह्मविद्याको पुरुषार्थ- का हेतु बताना अर्थवादमात्र है; यथा = जिस प्रकार; अन्येषु = यज्ञके दूसरे अङ्गोंमे फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है; इति = यह; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य कहते हैं । व्याख्या—आचार्य जैमिनि यह मानते हैं कि आत्मा कर्मका कर्ता होनेसे उसके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विद्या भी कर्मका अङ्ग है; इसलिये उसे पुरुषार्थ- का साधन बताना उसकी प्रशंसा करना है । पुरुषार्थका साधन तो वास्तवमे कर्म ही है । जिस प्रकार कर्मके दूसरे अङ्गोंकी फलश्रुति उनकी प्रशंसामात्र समझी जाती है, वैसे ही इसे भी समझना चाहिये । सम्बन्ध—विद्या कर्मका अङ्ग है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये कारण बतलाते हैं— आचारदर्शनात् ॥ ३ । ४ । ३ ॥ आचारदर्शनात् = श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अङ्ग है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह प्रसङ्ग आया है कि 'राजा जनकने एक समय बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया और उसमे कुरु तथा पाञ्चालदेशके बहुत-से ब्राह्मण एकत्र हुए थे।' इत्यादि (बृह० उ० ३ । १ । १) छान्दोग्यमें वर्णन आया है कि राजा अश्वपतिने अपने पास ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये आये हुए ऋषियोंसे कहा— 'आपलोग सुने, मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कंजूस है, न मद्य पीनेवाला है, न अग्निहोत्र न करनेवाला है और न कोई विद्याहीन है । यहाँ कोई परस्त्रीगामी पुरुष ही नहीं है; फिर कुलटा स्त्री कैसे रह सकती है ?* हे पूज्यगण ! मैं अभी यज्ञ करनेवाला हूँ । एक-एक ऋत्विजको जितना धन दूँगा, उतना ही

  • न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः । नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥