ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 322, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा पाद तीसरे पादमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायभूत भिन्न-भिन्न विद्याओंके विषयमें प्रतीत होनेवाले विरोधको दूर किया गया तथा उन विद्याओंमेंसे किस विद्याके कौन-से गुण दूसरी विद्यामें ग्रहण किये जा सकते हैं, कौन-से नहीं किये जा सकते ? इन विद्याओंका अलग-अलग अनुष्ठान करना उचित है या इनमेंसे कुछका समुच्चय भी किया जा सकता है ? इत्यादि विषयोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया । अब ब्रह्मज्ञान परमात्माकी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है या नही ? उसके अन्तरङ्ग साधन कौन-से हैं और बहिरङ्ग कौन-से हैं ? इन सब बातोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है । यहाँ पहले परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थकी सिद्धि केवल ज्ञानसे ही होती है या कर्मादिके समुच्चयसे ? इसपर विचार आरम्भ करनेके लिये वेदव्यासजी अपना निश्चित मत बतलाते हैं-- पुरुषार्थोऽतःशब्दादिति बादरायणः ॥ ३ । ४ । १ ॥ पुरुषार्थः=परब्रह्मकी प्राप्ति; अतः=इससे अर्थात् ब्रह्मज्ञानसे होती है; शब्दात्=क्योंकि शब्द ( श्रुतिके वचन ) से यही सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः=बादरायण कहते हैं । व्याख्या--वेदव्यासजी महाराज सबसे पहले अपना मत बतलाते हैं कि ‘तरति शोकमात्मवित्’— आत्मज्ञानी शोक-मोहसे तर जाता है ( छा० उ० ७ । १ । ३ ); ‘तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।’—ज्ञानी महात्मा नामरूपसे मुक्त होनेपर परात्पर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ( मु० उ० ३ । २ । ८ ), ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’—‘ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त हो जाता है’ ( तै० उ० २ । १ ), ‘ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।’— ‘परम देवको जानकर सब प्रकारके पाशों ( बन्धनों ) से मुक्त हो जाता है’ ( श्वेता० उ० ५ । १३ ) । इस प्रकार श्रुतिका कथन होनेसे यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि इस ब्रह्मज्ञानसे ही होती है ।