भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

३०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ निकलनेवाले ब्रह्मचारीके लिये है। अतः जिसने ब्रह्मविद्याका केवल अध्ययन किया है, मनन और निदिध्यासनपूर्वक उसका अनुष्ठान नहीं किया, ऐसे अधिकारीके प्रति अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मोंका विधान है, जो कि सर्वथा उचित है; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग है। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे जो अन्तिम श्रुति-प्रमाण दिया गया है, उसका उत्तर चार सूत्रोंमें अनेक प्रकारसे देते हैं— नाविशेषात् ॥ ३ । ४ । १३ ॥ अविशेषात् = वह श्रुति विशेषरूपसे विद्वान्के लिये नहीं कही गयी है, इसलिये; न = ज्ञानके साथ उसका समुच्चय नहीं है। व्याख्या—वहाँ जो त्यागपूर्वक आजीवन कर्म करनेके लिये कहा है, वह कथन सभी साधकोंके लिये समानभावसे है; ज्ञानीके लिये विशेषरूपसे नहीं है। अतः उससे न तो यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका अङ्ग है और न यही सिद्ध होता है कि केवल ब्रह्मविद्यासे परम पुरुषार्थ प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध—यदि उस श्रुतिको समानभावसे सबके लिये मान लिया जाय तो फिर उसके द्वारा ज्ञानीके लिये भी तो कर्मका विधान हो ही जाता है, इसपर कहते हैं— स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३ । ४ । १४ ॥ वा = अथवा यों समझो कि; स्तुतये = विद्याकी स्तुतिके लिये; अनुमतिः = सम्मतिमात्र है। व्याख्या = यदि इस श्रुतिको समानभावसे ज्ञानीके लिये भी माना जाय तो उसका यह भाव समझना चाहिये कि ज्ञानी लोकसंग्रहार्थ आजीवन कर्म करता रहे तो भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसमे कर्म लिप्त नहीं होते। वह उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित रहता है। इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा करनेके लिये यह श्रुति कर्म करनेकी सम्मतिमात्र देती है, उसे कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती; अतः यह श्रुति विद्याको कर्मोंका अङ्ग बतलानेके लिये नहीं है। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— कामकारेण चैके ॥ ३ । ४ । १५ ॥