ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७ व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो 'यदेव विद्यया करोति' (छा० उ० १ । १ । १०) इत्यादि श्रुतिका प्रमाण दिया है, वह एकदेशीय है। उस प्रकरणमे आयी हुई उद्गीथ-विद्यासे ही उसका सम्बन्ध है, अतः उसको ही वह कर्मका अङ्ग बताती हैं; अन्य सब प्रकरणोंमें वर्णित समस्त विद्याओसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः उस एकदेशीय श्रुतिमे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि विद्यामात्र कर्मका अङ्ग है। सम्बन्ध—पांचवें सूत्रमे पूर्वपक्षीने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके विषयमे उत्तर देते हैं— विभागः शतवत् ॥ ३ । ४ । ११ ॥ शतवत्=एक सौ मुद्राके विभागकी भाँति; विभागः=उस श्रुतिमें कहे हुए विद्या-कर्मका विभाग अधिकारिभेदसे समझना चाहिये। व्याख्या—जिस प्रकार किसीको आज्ञा दी जाय कि 'एक सौ मुद्रा उपस्थित लोगोंको दे दो।' तो सुननेवाला पुरुष पानेवाले लोगोंके अधिकारके अनुसार विभाग करके उन मुद्राओंका वितरण करेगा। उसी प्रकार इस श्रुतिके कथनका भाव भी अधिकारीके अनुसार विभागपूर्वक समझना चाहिये। जो ब्रह्मज्ञानी है, उसके कर्म तो यहां नष्ट हो जाते हैं। अत वह केवल विद्याके बलसे ही ब्रह्मलोकको जाता है। उसके साथ कर्म नहीं जाते (मु० उ० १ । २ । ११ ) और जो सांसारिक मनुष्य हैं या साधनभ्रष्ट है, उनके साथ विद्या और कर्म दोनोंके ही मस्कार जाते हैं। वहाँ विद्याका अर्थ परमात्माका अपरोक्षज्ञान नहीं; किन्तु केवल श्रवण, मनन आदिका अभ्यास समझना चाहिये। अत इससे भी विद्या कर्मका अङ्ग हैं, यह सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसं जो छठे सूत्रमें प्रजापतिके वचनोका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— अध्ययनमात्रवतः ॥ ३ । ४ । १२ ॥ अध्ययनमात्रवतः = जिसने विद्याका केवल अध्ययनमात्र किया है, अनुष्ठान नहीं, ऐसे विद्वान्के विषयमें यह कथन है। व्याख्या—प्रजापतिके उपदेशमे जो विद्यासम्पन्न पुरुषके लिये कुटुम्बमे जाने और कर्म करनेकी बात कही गयी हैं, वह कथन गुरुकुलसे अध्ययनमात्र करके