ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३ स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ ३ । ४ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो; उपादानात्=उद्गीथ आदि उपासनाओमे जो उनकी महिमाके सूचक वचन है, उनमे कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिको लेकर वैसा वर्णन किया गया है, इसलिये; स्तुतिमात्रम्=वह सब, केवल उनकी स्तुतिमात्र है; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; अपूर्वत्वात्=क्योकि वे उपासनाएँ और उनके रसतमत्व आदि गुण अपूर्व है । व्याख्या—यदि कहो कि 'यह जो उद्गीथ है, वह रसोका भी उत्तम रस है, परमात्माका आश्रयस्थान और पृथिवी आदि रसोमे आठवाँ सर्वश्रेष्ठ रस है ।' ( छा० उ० १ । १ । ३ ) इस प्रकारसे जो उद्गीथके विषयमे वर्णन है, वह केवल स्तुतिमात्र है, क्योकि यज्ञके अङ्गभूत उद्गीथको लेकर ऐसा कहा गया है । इसी प्रकार सभी कर्माङ्गभूत उपासनाओमे जिन-जिन विशेष गुणोका वर्णन है, वह सब उस-उस अङ्गकी स्तुतिमात्र है, इसलिये विद्या कर्मका अङ्ग है; तो यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके सम्बन्धसे बताये हुए गुण अपूर्व है । जो अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त न हो, उसे अपूर्व कहते हैं । इन उपासनाओ और उनके गुणोंका न तो अन्यत्र कहीं वर्णन है और न अनुमान आदिसे ही उनका ज्ञान होता है; अतः उन्हे अपूर्व माना गया है, इसलिये यह कथन स्तुतिके लिये नहीं, किन्तु उद्गीथ आदिको प्रतीक बनाकर उसमे उपास्यदेवकी भावना करनेके लिये स्पष्ट प्रेरणा देनेवाला विधिवाक्य है । अतः विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको पुष्ट करते हैं— भावशब्दाच्च ॥ ३ । ४ । २२ ॥ च=इसके सिवा; ( उस प्रकरणमे ) भावशब्दात्=इस प्रकार उपासना करनी चाहिये इत्यादि विधिवाचक शब्दोका स्पष्ट प्रयोग होनेके कारण भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—केवल अपूर्व होनेसे ही उसे विधि-वाक्य माना जाता हो, ऐसी बात नहीं है । उस प्रकरणमे 'उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० १ । १ । १ ) 'सामकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० २ । २ । १ ) इत्यादि रूपसे अत्यन्त स्पष्ट विधिसूचक शब्दोंका प्रयोग भी है । जैसे उनकी