ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अपूर्व विधि है, उसी प्रकार उन-उन उपासनाओंका अपूर्व फल भी बतलाया गया है ( छा० उ० १ । १ । ७; १ । ७ । ९ और २ । २ । ३ ) । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि वह कथन कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी स्तुतिके लिये नहीं है, उनको प्रतीक बनाकर उपासनाका विधान करनेके लिये है और इसीलिये विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है । सम्बन्ध—भिन्न-भिन्न प्रकरणोंमें जो आख्यायिकाओंका ( इतिहासोंका ) वर्णन है, उसका क्या अभिप्राय है? इसका निर्णय करके विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ ३ । ४ । २३ ॥ चेत् = यदि कहो; पारिप्लवार्थाः = उपनिषदोंमे वर्णित आख्यायिकाएँ पारिप्लव नामक कर्मके लिये है; इति न = तो यह ठीक नहीं है; विशेषितत्वात् = क्योंकि पारिप्लव-कर्ममे कुछ ही आख्यायिकाओंको विशेषरूपसे ग्रहण किया गया है । व्याख्या—‘उपनिषदोंमे जो यम और नचिकेता, देवता और यक्ष, मैत्रेयी और याज्ञवल्क्य, प्रतर्दन और इन्द्र, जानश्रुति और रैक तथा याज्ञवल्क्य और जनक आदिकी कथाएँ आती हैं; वे यज्ञ-सम्बन्धी पारिप्लवनामक कर्मकी अङ्गभूत है; क्योकि ‘पारिप्लवमाचक्षीत’ (‘पारिप्लव’ नामक वैदिक उपाख्यान कहे) इस विधि-वाक्यद्वारा श्रुतिमे उसका स्पष्ट विधान किया है । अश्वमेधयागमे जो रात्रिके समय कुटुम्बसहित बैठे हुए राजाको अध्वर्यु वैदिक उपाख्यान सुनाता है, वही ‘पारिप्लव’ कहलाता है । इस पारिप्लव कर्मके लिये ही उपर्युक्त कथाएँ हैं ।’ ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है; क्योकि पारिप्लवका प्रकरण आरम्भ करके श्रुतिने ‘मनुर्वैवस्वतो राजा’ इत्यादि वाक्योंद्वारा कुछ विशेष उपाख्यानोंको ही वहाँ सुनानेयोग्य कहा है । उनमे ऊपर बतायी हुई उपनिषदोंकी कथाएँ नहीं आती है । अतः वे पारिप्लव कर्मकी अङ्गभूत नहीं है । वे सब आख्यान ब्रह्मविद्याको भलीभाँति समझानेके लिये कहे हुए ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग हैं । इसीलिये इन सब आख्यानोंका विशेष माहात्म्य बतलाया गया है ( क० उ० १ । ३ । १६ ) । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं—