ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें३३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या-आत्रेय ऋषि मानते हैं कि श्रुतिमे 'जो इस उपासनाको इस प्रकार जानता है, वह पुरुष वृष्टिमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है, वह वर्षा करानेमे समर्थ होता है।' (छा० उ० २। ३। २) बृहदारण्यकोपनिषद्में प्रस्तोताद्वारा की जानेवाली अनेक प्रार्थनाओंका उल्लेख करके अन्तमे उद्गाताका कर्म बताते हुए कहा है कि 'उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिसकी कामना करता है, उसका आगान करता है' (बृह० उ० १। ३। २८)। इस प्रकार फलका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंसे सिद्ध होता है कि यज्ञके स्वामीको उसका फल मिलता है, अतएव इन फलकामनायुक्त उपासनाओंका कर्तापन भी स्वामी अर्थात् यजमानका ही होना उचित है। सम्बन्ध-इसपर दूसरे आचार्यका मत कहते हैं- आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३ । ४ । ४५ ॥ आर्त्विज्यम्=कर्तापन ऋत्विक्का है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं; हि=क्योंकि; तस्मै=उस कर्मके लिये; परिक्रीयते=वह ऋत्विक् यजमानद्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। व्याख्या-आचार्य औडुलोमि ऐसा मानते हैं कि कर्तापन यजमानका नहीं, किन्तु ऋत्विक्का ही है; तथापि फल यजमानको मिलता है, क्योकि वह ऋत्विक् उस कर्मके लिये यजमानके द्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। अतः वह दाताद्वारा दी हुई दक्षिणाका ही अधिकारी है; उसका फलमें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध-सूत्रकार श्रुतिप्रमाणसे अपनी सम्मति प्रकट करते हैं- श्रुतेश्च ॥ ३ । ४ । ४६ ॥ श्रुतेः=श्रुतिप्रमाणसे; च=भी (औडुलोमिका ही मत उचित सिद्ध होता है)। व्याख्या-यज्ञका ऋत्विक् जो कुछ भी कामना करता है, वह निःसन्देह यजमानके लिये ही करता है (शत० १। ३ । १ । १६) इसलिये इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन-किन भोगोका आगान करूँ' (छा० उ० १। ७। ८) इत्यादि श्रुतियोंसे भी कर्मका कर्तापन ऋत्विक्का और फलमे अधिकार यजमानका सिद्ध होता है।