भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ४५-४७ ] अध्याय ३ ३३१

सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसङ्गानुसार सकाम उपासनाके फल और कर्त्तापनका निर्णय किया गया । अब ब्रह्मविद्याका अधिकार किसी एक ही आश्रममें है या सभी आश्रमोंमें ? इस बातका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३।४।४७॥ तद्वतः = ब्रह्मविद्यासे युक्त साधकके लिये; तृतीयम् = बालकपन और पाण्डित्यके साथ कहा हुआ जो तीसरा मौन साधन है, वह विधेय है; सहकार्यन्तरविधिः = (क्योंकि) उसका दूसरे सहकारी साधनके रूपमे विधान है; विध्यादिवत् = दूसरे स्थलमे कहे हुए विधिवाक्योंकी भाँति; पक्षेण = एक पक्ष- को लेकर यह भी विधि है । व्याख्या—कहोलने याज्ञवल्क्यसे साक्षात् परब्रह्मका स्वरूप पूछा, उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सबके अन्तरात्मा परमात्माका स्वरूप सङ्केतसे बताकर कहा कि ‘जो शोक, मोह, भूख, प्यास, बुढापा और मृत्युसे अतीत है, वह परमात्मा है, ऐसे इस परमात्माको जानकर ब्राह्मण पुत्रकामना, धनकामना तथा मान-बड़ाई और स्वर्गसम्बन्धी लोककामनासे विरक्त होकर भिक्षासे निर्वाह करनेवाले मार्गसे विचरता है।’ इसके बाद इन तीनों कामनाओंकी एकता करके कामनामात्रको त्याज्य बताया और अन्तमें कहा कि ‘वह ब्राह्मण उस पाण्डित्यको भलीभाँति समझकर बाल्यभावसे स्थित रहनेकी इच्छा करे, फिर उससे भी उपरत होकर मुनि हो जाय, फिर वह मौन और अमौन—दोनोंसे उपरत होकर ब्राह्मण हो जाता है अर्थात् ब्रह्मको भलीभाँति प्राप्त हो जाता है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१) । इस प्रकरणमे संन्यास-आश्रममे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन किया गया । इस वर्णनमे पाण्डित्य और बाल्यभावके अन्तमे तो 'तिष्ठासेत्' (स्थित रहनेकी इच्छा करे) यह विधिवाक्य है; परन्तु मुनि शब्दके बाद कोई विधि नहीं है, इसलिये सूत्रकारका कहना है कि जिस प्रकार अन्यत्र कहे हुए वचनोंमें स्पष्ट विधिका प्रयोग न होनेपर सहकारीभावसे एकके लिये प्रयुक्त विधिवाक्य दूसरेके लिये भी मान लिये जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी पाण्डित्य और बाल्यभाव इन दो सहकारी साधनोंसे युक्त साधकके प्रति उनके साथ कहे