भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ४५-४७ ] अध्याय ३ ३३१

सूत्र ४५-४७ ] अध्याय ३ ३३१

सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसङ्गानुसार सकाम उपासनाके फल और कर्त्तापनका निर्णय किया गया । अब ब्रह्मविद्याका अधिकार किसी एक ही आश्रममें है या सभी आश्रमोंमें ? इस बातका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३।४।४७॥ तद्वतः = ब्रह्मविद्यासे युक्त साधकके लिये; तृतीयम् = बालकपन और पाण्डित्यके साथ कहा हुआ जो तीसरा मौन साधन है, वह विधेय है; सहकार्यन्तरविधिः = (क्योंकि) उसका दूसरे सहकारी साधनके रूपमे विधान है; विध्यादिवत् = दूसरे स्थलमे कहे हुए विधिवाक्योंकी भाँति; पक्षेण = एक पक्ष- को लेकर यह भी विधि है । व्याख्या—कहोलने याज्ञवल्क्यसे साक्षात् परब्रह्मका स्वरूप पूछा, उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सबके अन्तरात्मा परमात्माका स्वरूप सङ्केतसे बताकर कहा कि ‘जो शोक, मोह, भूख, प्यास, बुढापा और मृत्युसे अतीत है, वह परमात्मा है, ऐसे इस परमात्माको जानकर ब्राह्मण पुत्रकामना, धनकामना तथा मान-बड़ाई और स्वर्गसम्बन्धी लोककामनासे विरक्त होकर भिक्षासे निर्वाह करनेवाले मार्गसे विचरता है।’ इसके बाद इन तीनों कामनाओंकी एकता करके कामनामात्रको त्याज्य बताया और अन्तमें कहा कि ‘वह ब्राह्मण उस पाण्डित्यको भलीभाँति समझकर बाल्यभावसे स्थित रहनेकी इच्छा करे, फिर उससे भी उपरत होकर मुनि हो जाय, फिर वह मौन और अमौन—दोनोंसे उपरत होकर ब्राह्मण हो जाता है अर्थात् ब्रह्मको भलीभाँति प्राप्त हो जाता है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१) । इस प्रकरणमे संन्यास-आश्रममे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन किया गया । इस वर्णनमे पाण्डित्य और बाल्यभावके अन्तमे तो 'तिष्ठासेत्' (स्थित रहनेकी इच्छा करे) यह विधिवाक्य है; परन्तु मुनि शब्दके बाद कोई विधि नहीं है, इसलिये सूत्रकारका कहना है कि जिस प्रकार अन्यत्र कहे हुए वचनोंमें स्पष्ट विधिका प्रयोग न होनेपर सहकारीभावसे एकके लिये प्रयुक्त विधिवाक्य दूसरेके लिये भी मान लिये जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी पाण्डित्य और बाल्यभाव इन दो सहकारी साधनोंसे युक्त साधकके प्रति उनके साथ कहे

३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ हुए इस तीसरे साधन मुनिभावके लिये भी विधिवाक्यका प्रयोग पक्षान्तरसे समझ लेना चाहिये । ध्यान रहे कि इस प्रकरणमे आये हुए बाल्यभावसे तो दम्भ, मान आदि विकारोंका अभाव दिखाया गया है और मननशीलताको मौन कहा गया है । अतः ब्रह्मका शास्त्रीय ज्ञान ( पाण्डित्य ), उक्त विकारोका अभाव ( बाल्यभाव ) और निरन्तर मनन तथा निदिध्यासन ( मौन ) —इन तीनोकी परिपक्व-अवस्था होनेसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, यही इस प्रकरणका भाव है । सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस प्रकरणपर विचार किया गया है, वह संन्यास- आश्रमका द्योतक है; अतः यह जिज्ञासा होती है कि संन्यास-आश्रममें ही ब्रह्मविद्याका साधन हो सकता है या अन्य आश्रमोंमे भी उसका अधिकार है ? यदि संन्यास-आश्रममें ही उसका साधन हो सकता है तो ( छा० उ० ८ । १५ । १ ) की श्रुतिमें गृहस्थ-आश्रमके साथ-साथ ब्रह्मविद्याका प्रकरण क्यों समाप्त किया गया है ? वहाँके वर्णनसे तो गृहस्थका ही अधिकार स्पष्टरूपसे सूचित होता है, अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं-- कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३ । ४ । ४८ ॥ कृत्स्नभावात् = गृहस्थ-आश्रममें सम्पूर्ण आश्रमोंका भाव है, इसलिये; तु = ही; गृहिणा = ( उस प्रकरणमें ) गृहस्थ-आश्रमके साथ; उपसंहारः = ब्रह्म- विद्याके प्रकरणका उपसंहार किया गया है । व्याख्या—गृहस्थ-आश्रममे चारो आश्रमोंका भाव है; क्योकि ब्रह्मचारी भी गृहस्थाश्रममें स्थित गुरुके पास ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करता है, वानप्रस्थ और संन्यासीका भी मूल गृहस्थ ही है । इस प्रकार चारो आश्रमोका गृहस्थमे अन्त- र्भाव है और ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमे है, यह भी श्रुतिका अभिप्राय है, इसलिये वहाँ उस प्रकरणका गृहस्थके वर्णनके साथ-साथ उपसंहार किया गया है तथा पूर्वप्रकरणमें जो संन्यास-आश्रमका संकेत है, वह साधनोकी सुगमताको लक्ष्य करके कहा गया है; क्योकि किसी भी आश्रममे स्थित साधक- को ब्रह्मज्ञानसम्पादनके लिये पुत्रैषणा आदि सभी प्रकारकी कामनाओ तथा राग- द्वेषादि विकारोका सर्वथा नाश करके मननशील तो होना ही पड़ेगा । दूसरे आश्रमोंमें विघ्नोकी अधिकता है और संन्यास-आश्रममें स्वभावसे ही उनका अभाव

सूत्र ४८-५० ] अध्याय ३ ३३३

सूत्र ४८-५० ] अध्याय ३ ३३३ है। इस सुगमताको दृष्टिमे रखकर वैसा कहा गया है, न कि अन्य आश्रमोंमे ब्रह्मविद्याके अधिकारका निषेध करनेके लिये । सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे पुनः सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार 'सिद्ध किया जाता है— मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥ ३ । ४ । ४९ ॥ इतरेषाम् = अन्य आश्रमवालोके लिये; अपि = भी; मौनवत् = मननशीलताकी भाँति; उपदेशात् = ( विद्योपयोगी सभी साधनोंका ) उपदेश होनेके कारण ( सभी आश्रमोंमे ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध होता है )। व्याख्या—जिस प्रकार पूर्व प्रकरणमे मननशीलता ( मौन ) रूप साधनका सबके लिये विधान बताया गया है, इसी प्रकार श्रुतिमे अन्य आश्रमवालोंके लिये भी विद्योपयोगी सभी साधनोंका उपदेश दिया गया है। जैसे— 'इस प्रकार ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला शान्त ( मनको वशमे करनेवाला मननशील ), दान्त (इन्द्रिय-समुदायको वशमें करनेवाला ), उपरत ( भोगोंसे सम्बन्धरहित ), तितिक्षु ( सुख-दुःखसे विचलित न होनेवाला ) और समाहित ( ध्यानस्थ ) होकर अपने ही भीतर उस सबके आत्मस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है।' (बृह० ३ ० ४ । ४ । २३)। ऐसी ही बात दूसरे प्रकरणोंमें भी कही है। इससे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है। सम्बन्ध—सैंतालीसवें सूत्रके प्रकरणमे जो बाल्यभावसे स्थित होनेकी बात कही गयी थी, उसमे बालकके कौन-से भावोंका ग्रहण है, यह स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं— अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ ३ । ४ । ५० ॥ अनाविष्कुर्वन् = अपने गुणोंको प्रकट न करता हुआ बालककी भाँति दम्भ और अभिमानसे रहित होवे; अन्वयात् = क्योकि ऐसे भावोंका ही ब्रह्मविद्यासे सम्बन्ध है। व्याख्या—बालकमें मान, दम्भ तथा राग-द्वेष आदि विकारोंका अभाव है; अतः उसीकी भाँति उन विकारोंसे रहित होना ही यहाँ बाल्य-भाव है। अपवित्र- भक्षण, आचारहीनता, अशौच और स्वेच्छाचारिता आदि निषिद्ध भावोंको ग्रहण करना यहाँ अभीष्ट नहीं है। विद्याके सहकारी साधनरूपसे श्रुतिमे बाल्यभावका

३३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ उल्लेखं हुआ है। अतः उसके उपयोगी भाव ही लिये जा सकते है, विरोधी भाव नहीं। इससे श्रुतिका यही भाव मालूम होता है कि ब्रह्मविद्याका साधक बालककी भाँति दम्भ, अभिमान तथा राग-द्वेष आदिसे रहित होकर विचरे। सम्बन्ध—यहाँतक यह निश्चय किया गया कि सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है। अब यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रोंमें जो ब्रह्मविद्याका फल जन्म- मृत्यु आदि दुःखोंसे छूटना और परमात्माको प्राप्त हो जाना बताया गया है, वह इसी जन्ममें प्राप्त हो जाता है या जन्मान्तरमें ? इसपर कहते हैं— ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ५१ ॥ अप्रस्तुतप्रतिबन्धे=किसी प्रकारका प्रतिबन्ध उपस्थित न होनेपर; ऐहिकम्=इसी जन्ममे वह फल प्राप्त हो सकता है; अपि= ( प्रतिबन्ध होनेपर ) जन्मान्तरमे भी हो सकता है; तद्दर्शनात्=क्योकि यही बात श्रुतियो और स्मृतियोमें देखी जाती है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा गया है कि गर्भमे स्थित वामदेव ऋषिको ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो गयी थी । ( ऐ० उ० २ । ५ ) भगवद्गीतामे कहा है कि 'न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ।' 'कल्याणमय कर्म अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती।' ( ६ । ४० ) । 'किन्तु वह दूसरे जन्ममे पूर्वजन्म-सम्बन्धी शरीरद्वारा प्राप्त की हुई बुद्धिसे युक्त हो जाता है और पुनः परमात्माकी प्राप्तिके साधनमे लग जाता है ।'* ( गीता ६ । ४३ ) इस प्रकार श्रुतियो और स्मृतियोंके प्रमाणोको देखनेसे यही सिद्ध होता है कि यदि किसी प्रकारका कोई प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, तब तो इसी जन्ममे उसको मुक्ति- रूप फलकी प्राप्ति हो जाती है और यदि कोई विघ्न पड़ जाता है तो जन्मान्तरमे वह फल मिलता है । तथापि यह निश्चय है कि किया हुआ अभ्यास व्यर्थ नहीं जाता । सम्बन्ध—उपर्युक्त ब्रह्मविद्याका मुक्तिरूप फल किसी प्रकारका प्रतिबन्ध न रहनेके कारण जिस साधकको इसी जन्ममें मिलता है, उसे यहाँ मृत्युलोकमें ही मिल जाता है या लोकान्तरमें जाकर मिलता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- ✲ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥

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श्रीपरमात्मने नमः चौथा अध्याय पहला पाद तीसरे अध्यायमें परमात्माकी प्राप्तिके भिन्न-भिन्न साधनोंको बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार किया गया; अब उन उपासनाओंके फलविषयक श्रुतियों- पर विचार करनेके लिये फलाध्यायनामक चौथा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँपर यह जिज्ञासा होती है कि पूर्वोक्त उपासनाएँ गुरुद्वारा अध्ययन कर लेनेमात्रसे ही अपना फल देनेमें समर्थ हैं या उनके साधनोंका बार-बार अभ्यास करना चाहिये ? इसपर कहते हैं— आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ४ । १ । १ ॥ आवृत्तिः=अध्ययन की हुई उपासनाका आवर्तन (बार-बार अभ्यास) करना चाहिये; असकृदुपदेशात्=क्योंकि श्रुतिमें अनेक बार इसके लिये उपदेश किया गया है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।'—'वह परमात्मा ही दर्शन करने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और ध्यान करने योग्य है।' (बृह० उ० ४ । ५ । ६)। 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ।' अर्थात् 'विशुद्ध अन्तःकरणवाला साधक उस अवयवरहित परमेश्वरको निरन्तर ध्यान करता हुआ ज्ञानकी निर्मलतासे देखता है।' (मु० उ० ३ । १ । ८)। 'उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ।'—'जो कामनारहित साधक उस परम- पुरुषकी उपासना करते हैं, वे इस रजोवीर्यमय शरीरको अतिक्रमण कर जाते हैं।' (मु० उ० ३ । २ । १) इस प्रकार जगह-जगह ब्रह्मविद्यारूप उपासनाका अभ्यास करनेके लिये बार-बार उपदेश दिया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि आचार्यसे भलीभाँति ब्रह्मविद्याका अध्ययन करके उसपर बार-बार विचार करते हुए उस परमात्मामें संलग्न होना चाहिये।

सूत्र १-३ ] अध्याय ४ ३३७

सूत्र १-३ ] अध्याय ४ ३३७ सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— लिङ्गाच्च ॥ ४ । १ । २ ॥ लिङ्गात्=स्मृतिके वर्णनरूप लिङ्ग (प्रमाण) से; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-भगवद्गीतामे जगह-जगह यह बात कही है कि 'सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर'—'सब कालमे मेरा स्मरण कर।' (गीता ८ । ७)। 'परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।' 'बार-बार चिन्तन करता हुआ साधक परम पुरुषको प्राप्त होता है।' (गीता ८ । ८)। 'जो सदा अनन्यचित्त होकर मुझे नित्य स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मै सुलभ हूँ।'* (गीता ८ । १४) 'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।'—'मुझमे मन लगाकर नित्य योगयुक्त होकर जो मेरी उपासना करते हैं।' (गीता १२ । २) इसी प्रकार दूसरी स्मृतियोमे भी कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये। सम्बन्ध-उस परम प्राप्य परब्रह्मका किस भावसे निरन्तर चिन्तन करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥ ४ । १ । ३ ॥ आत्मा=वह मेरा आत्मा है; इति=इस भावसे; तु=ही; उपगच्छन्ति = ज्ञानीजन उसे जानते या प्राप्त करते हैं; च=और; ग्राहयन्ति=ऐसा ही ग्रहण कराते या समझाते हैं। व्याख्या—'यह आत्मा ब्रह्म है, यह आत्मा चार पादवाला है' इत्यादि (मा० उ० २) 'सबका अन्तर्वर्ती यह तेरा आत्मा है।' (बृह० उ० ३ । ४ । १ ) 'यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ० ३ । ७ । ३ ) इसी प्रकार उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे बार-बार कहा है कि 'वह सत्य है, वह आत्मा है, वह तू है।' (छा० उ० ६ । ८ से १६ वें खण्ड- तक) 'जो आत्मामें स्थित हुआ आत्माका अन्तर्यामी है, जिसको आत्मा नहीं जानता, जिसका आत्मा शरीर है, वह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ०

  • अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ वे० द० २२—

३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ३ । ७ । २२) । इस प्रकार श्रुतिमे उस परब्रह्म परमात्माको अपना अन्तर्यामी आत्मा मानकर उपासना करनेका विधान आता है तथा भगवद्गीतामें भी भगवान्- ने अपनेको सबका अन्तर्यामी बताया है (गीता १८ । ६१) । दूसरी श्रुतिमे भी उस ब्रह्मको हृदयरूप गुहामे निहित बताकर उसे जाननेवाले विद्वान्की महिमाका वर्णन किया गया है। (तै० उ० २ । १) इसलिये साधकको उचित है कि वह परमेश्वरको अपना अन्तर्यामी आत्मा समझकर उसी भावसे उसकी उपासना करे। सम्बन्ध—क्या प्रतीकोपासनामें भी ऐसी ही भावना करनी चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न प्रतीके न हि सः ॥ ४ । १ । ४ ॥ प्रतीके=प्रतीकमे; न=आत्मभाव नहीं करना चाहिये; हि=क्योकि; सः= वह; न=उपासकका आत्मा नहीं है। व्याख्या—'मन ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १) 'आकाश ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १) 'आदित्य ब्रह्म है, यह आदेश है।' (छा० उ० ३ । १९ । १) इस प्रकार जो भिन्न-भिन्न पदार्थोंमे ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका कथन है, वही प्रतीकोपासना है। वहाँ प्रतीकमे आत्मभाव नहीं करना चाहिये; क्योकि वह उपासकका अन्तरात्मा नहीं है। जैसे मूर्ति आदिमे भगवान्की भावना करके उपासना की जाती है, उसी प्रकार मन आदि प्रतीकमे भी उपासना करनेका विधान है। भाव यह है कि पूर्वोक्त मन, आकाश, आदित्य आदिको प्रतीक बनाकर उनमे भगवान्के उद्देश्यसे की हुई जो उपासना है, उसे परम दयालु पुरुषोत्तम परमात्मा अपनी ही उपासना मानकर ग्रहण करते है और उपासकको उसकी भावनाके अनुसार फल भी देते है; इसीलिये वैसी उपासनाका भी विधान किया गया है। परन्तु प्रतीकको अपना अन्तर्यामी आत्मा नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—प्रतीकोपासना करनेवालेको प्रतीकमे ब्रह्मभाव करना चाहिये या ब्रह्ममें उस प्रतीकका भाव करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ४ । १ । ५ ॥

सूत्र ४-६ ] अध्याय ४ ३३९

सूत्र ४-६ ] अध्याय ४ ३३९ उत्कर्षात्=ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये; ब्रह्मदृष्टिः=प्रतीकमें ब्रह्मदृष्टि करनी चाहिये (क्योंकि निकृष्ट वस्तुमे ही उत्कृष्टकी भावना की जाती है)। व्याख्या—जब किसी देवताकी प्रत्यक्ष उपासना करनेका साधन सुलभ नहीं हो, तब सुविधापूर्वक उपलब्ध हुई साधारण वस्तुमे उस देवताकी भावना करके उपासना की जाती है, देवतामे उस वस्तुकी भावना नहीं की जाती है; क्योंकि वैसा करनेका कोई उपयोग ही नहीं है। उसी प्रकार जो साधक उस परब्रह्म परमात्माके तत्त्वको नहीं समझ सकता, उसके लिये प्रतीकोपासनाका विधान किया गया है, अतः उसे चाहिये कि इन्द्रिय आदिसे प्रत्यक्ष अनुभवमे आनेवाले प्राण, मन, सूर्य, चन्द्रमा आदि किसी भी पदार्थको उस परब्रह्म परमात्माका प्रतीक बनाकर उसमे ब्रह्मकी भावना करके उपासना करे; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ है और निकृष्टमें ही श्रेष्ठकी भावना की जाती है, श्रेष्ठमे निकृष्टकी नहीं। इस प्रकार प्रतीकमें ब्रह्मभाव करके उपासना करनेसे वह परब्रह्म परमात्मा उस उपासनाको अपनी ही उपासना मानते हैं। सम्बन्ध—अब कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिके विषयमे कहते हैं— आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ४ । १ । ६ ॥ च=तथा; अङ्गे=कर्माङ्गभूत उद्गीथ आदिमे; आदित्यादिमतयः=आदित्य आदिकी बुद्धि करनी चाहिये; उपपत्तेः=क्योंकि ऐसा करनेसे कर्मसमृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। व्याख्या—कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमे जो आदित्य आदिकी भावना- पूर्वक उपासना करनेका विधान किया गया है (छा० उ० १।३।१ तथा २। २।१) वह अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि ऐसा करनेसे कर्म-समृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। आत्मभाव करनेका ऐसा कोई फल नहीं दिखायी देता, अतः उसका निषेध किया गया है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि कनिष्ठ वस्तुमें श्रेष्ठकी भावनाका नाम प्रतीक-उपासना है। सम्बन्ध—यह जिज्ञासा होती है कि साधकको किसी आसनपर बैठकर उपासना करनी चाहिये या चलते-फिरते प्रत्येक परिस्थितिमें वह उपासना कर सकता है? इसपर कहते हैं—

३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आसीनः सम्भवात् ॥ ४ । १ । ७ ॥ आसीनः=बैठे हुए ही ( उपासना करनी चाहिये ); सम्भवात्=क्योंकि बैठकर ही निर्विघ्न उपासना करना सम्भव है । व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरका जैसा रूप सुनने और विचार करनेपर समझमें आया है, उसका बार-बार तैलधाराकी भाँति निरन्तर चिन्तन करते रहनेका नाम उपासना है । यह उपासना चलते-फिरते या अन्य शरीरसम्बन्धी काम करते समय नहीं हो सकती; क्योंकि उस समय चित्त विक्षिप्त रहता है तथा सोते हुए करनेमें भी निद्रारूप विघ्नका आना स्वाभाविक है; अतः केवल बैठकर करनेसे ही निर्विघ्न उपासना हो सकती है । इसलिये उपासनाका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है कि 'उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ।' अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तः- करणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे ।' ( गीता ६ । १२ ) । सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥ ध्यानात्=उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये ) । व्याख्या—अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है ( मु० उ० ३ । १ । ८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है । अतएव यह बैठकर ही किया जा सकता है, चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता । सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४ । १ । ९ ॥ च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=रखते हुए ध्यान करनेका उपदेश है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ 'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि सिर, ग्रीवा और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और स्थिर करके समस्त

सूत्र ७-११ ] अध्याय ४ ३४१

सूत्र ७-११ ] अध्याय ४ ३४१ इन्द्रियोंको मनके द्वारा हृदयमे निरुद्ध करके ॐकाररूप नौकाद्वारा समस्त भय- दायक जन्मान्तररूप स्रोतोसे तर जाय ।' ( श्वेता० उ० २ । ८ ) । इस श्रुतिसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उपासनाके लिये शरीरकी भी अचलता आवश्यक है, इसलिये भी उपासना बैठकर ही की जानी चाहिये । सम्बन्ध—उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे दृढ करते हैं— स्मरन्ति च ॥ ४ । १ । १० ॥ च=तथा; स्मरन्ति=ऐसा ही स्मरण करते हैं । व्याख्या—स्मृतिमे भी यही बात कही गयी है— समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ 'काया, शिर और ग्रीवाको सम और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि लगाकर, अन्य दिशाओको न देखता हुआ निर्भय होकर, भलीभाँति विक्षेपरहित, शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्यव्रतमे स्थित रहते हुए, मनको वशमें करके, मुझमे चित्त लगाये हुए, मुझे ही अपना परम प्राप्य मानकर साधन करनेके लिये बैठे ।' ( गीता ६ । १३-१४ ) । इस प्रकार स्मृति-प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है कि परम प्राप्य परमात्माके निरन्तर चिन्तनरूप ध्यानका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । सम्बन्ध—उक्त साधन कैसे स्थानमें बैठकर करना चाहिये ? इस जिज्ञासा- पर कहते हैं— यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ४ । १ । ११ ॥ अविशेषात्=किसी विशेष स्थान या दिशाका विधान न होनेके कारण ( यही सिद्ध होता है कि ); यत्र=जहाँ; एकाग्रता=चित्तकी एकाग्रता ( सुगमतासे हो सके ); तत्र=वहीं ( बैठकर ध्यानका अभ्यास करे ) । व्याख्या—श्रुतिमे कहा है कि—

३४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ समे शुचौ शर्करावह्नवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥ ‘जो सब प्रकारसे शुद्ध, समतल, कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल और आश्रयकी दृष्टिसे मनके अनुकूल हो, जहाँ आँखोंको पीड़ा पहुँचानेवाला दृश्य न हो और वायुका झोका भी न लगता हो ऐसे गुहा आदि स्थानमे बैठकर परमात्माके ध्यानका अभ्यास करना चाहिये।’ (श्वेता० उ० २ । १०) इस प्रकार किसी विशेष दिशा या स्थानका निर्देश न होने तथा मनके अनुकूल देशमे अभ्यास करनेके लिये श्रुतिकी आज्ञा प्राप्त होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि जहाँ सरलतासे मनकी एकाग्रता हो सके, ऐसा कोई भी पवित्र स्थान उपासनाके लिये उपयोगी हो सकता है। अतः जो अधिक प्रयास किये बिना प्राप्त हो सके, ऐसे निर्विघ्न और अनुकूल स्थानमे बैठकर ध्यानका अभ्यास करते रहना चाहिये। सम्बन्ध—इस प्रकार उपासनाका अभ्यास कबतक करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आ प्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम् ॥ ४ । १ । १२ ॥ आ प्रायणात् = मरणपर्यन्त (उपासना करते रहना चाहिये); हि = क्योंकि; तत्रापि = मरणकालमे भी; दृष्टम् = उपासना करते रहनेका विधान देखा जाता है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे प्रजापतिका यह वचन है कि—‘स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसंपद्यते।’—‘वह इस प्रकार पूरी आयुतक उपासनामे तत्पर रहकर अन्तमे निःसन्देह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।’ (छा० उ० ८ । १५ । १)। प्रश्नोपनिषद्की बात है, सत्यकामने अपने गुरु पिप्पलादसे पूछा—‘भगवन्! मनुष्योमेसे जो मरणपर्यन्त ॐकारका ध्यान करता है, वह किस लोकको जीत लेता है?’ (प्र० उ० ५ । १) इसपर गुरुने ॐकारकी महिमा वर्णन करके (५ । २) दो मन्त्रोमे इस लोक और स्वर्गलोककी प्राप्तिके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनाका फल बताया। (५ । ३-४) फिर अन्तमे कहा ‘जो तीन मात्राओंवाले ॐ इस अक्षरके द्वारा इस (हृदयस्थ) परमपुरुष-

सूत्र १२-१३ ] अध्याय ४ ३४३

सूत्र १२-१३ ] अध्याय ४ ३४३ का निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमे पहुँचता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीका त्याग कर देता है, ठीक उसी प्रकार, वह पापोंसे मुक्त होकर, सामवेदकी श्रुतियोंके अभिमानी देवताओंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है। वहाँ वह इस जीवघनरूप हिरण्यगर्भसे अत्यन्त श्रेष्ठ तथा सबके हृदयमे शयन करनेवाले परमपुरुषका साक्षात्कार करता है।' (प्र० उ० ५।५)। इस प्रकार मृत्युपर्यन्त निरन्तर उपासना करते रहनेका श्रुतिमे विधान होनेके कारण यही मानना उचित है कि आजीवन नित्य-निरन्तर उपासना करते रहना चाहिये। जिसको जीवनकालमें ही उस परमपुरुषका साक्षात्कार हो जाता है, उसका तो उस परमेश्वरमे कभी वियोग होता ही नहीं है, वह तो स्वभावसे ही उसमे संयुक्त हो जाता है। तथापि वह जो मरणपर्यन्त निरन्तर उपासना करता रहता है, वह उसके अन्य कर्मोंकी भाँति लोकसंग्रहके लिये है। परन्तु साधकके लिये तो मृत्युपर्यन्त उपासना परम आवश्यक है। अन्यथा योगभ्रष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म अनिवार्य हो जाता है (गीता ६। ३७ से ४०)। इसीलिये भगवान्ने मरण- पर्यन्त साधन करते रहनेके लिये जगह-जगह कहा है (गीता २।७२; ७। ३०; ८। ५; ८। ८, ९, १०, १२, १३ इत्यादि)। सम्बन्ध—यहाँतक उपासनाविषयक वर्णनकी समाप्ति करके अब परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले साधनोंके फलके सम्बन्धमे विचार आरम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जिसको जीवनकालमें ही परमात्मा- की प्राप्ति हो जाती है, उसके पूर्वार्जित तथा भावी पुण्य-पापरूप कर्मोंका क्या होता है? इसपर कहते हैं— तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्य- पदेशात् ॥ ४ । १ । १३ ॥ तदधिगमे = उस परब्रह्म परमात्माके प्राप्त हो जानेपर; उत्तरपूर्वाघयोः = आगे होनेवाले और पहलेके किये हुए पापोंका; अश्लेषविनाशौ = क्रमशः असम्पर्क एव नाश होता है; तद्व्यपदेशात् = क्योकि श्रुतिमे यही बात जगह-जगह कही गयी है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि 'यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एव- मेवंविदि पापं कर्म न लिप्यते।' अर्थात् 'जिस प्रकार कमलके पत्तेमे जल नहीं

३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सटता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त परमात्माको जाननेवाले महापुरुषमें पापकर्म लिप्त नहीं होते हैं।' (छा० उ० ४ । १४ । ३)। इस प्रकार श्रुतिके द्वारा ज्ञानोत्तरकालमे होनेवाले पापकर्मोंसे ज्ञानीका अलिप्त रहना कहा गया है तथा यह दृष्टान्त भी दिया गया है, 'जिस प्रकार सरकंडेकी सींकके अग्रभागमे रहनेवाली तुला अग्निमे गिराय़ी जानेपर तत्काल भस्म हो जाती है, इसी प्रकार इस ज्ञानीके समस्त पाप निःसन्देह भस्म हो जाते हैं।' (छा० उ० ५ । २४ । ३)। मुण्डक (२।२।८) और गीता (४ । ३७) मे भी ऐसा ही कहा गया है। इस प्रकार श्रुतियो और स्मृतियोमे ब्रह्मज्ञानके बाद लोकसंग्रहके लिये की जानेवाली व्यावहारिक चेष्टामे होनेवाले आनुषंगिक पापोका उसके साथ सम्बन्ध न होना और पूर्वकृत पापोका ,सर्वथा नष्ट हो जाना बताया जानेके कारण यही निश्चय होता है कि परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके बाद उस सिद्ध पुरुषके पूर्वकृत पापोका सर्वथा नाश हो जाता है और आगे होनेवाले पापोंसे उसका कभी सम्पर्क नहीं होता। सम्बन्ध-भगवत्प्राप्त पुरुषके पुण्यकर्मोंका क्या होता हे? इस जिज्ञासापर कहते हैं— इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ॥ ४ । १ । १४ ॥ इतरस्य=पुण्यकर्मसमुदायका; अपि=भी; एवम्=इसी प्रकार; असंश्लेषः= सम्बन्ध न होना और नाश हो जाना समझना चाहिये; पाते तु=देहपात होनेपर तो वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। व्याख्या-'यह पुण्य और पाप इन दोनोसे ही निःसन्देह तर जाता है।', (बृह० उ० ४ । ४ । २२) इस प्रकार श्रुतिमे कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि पाप-कर्मकी भाँति ही पूर्वकृत और आगे होनेवाले पुण्यकर्मोंसे भी जीवन्मुक्त अवस्थामे उस ज्ञानीका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, वह समस्त कर्मोंसे सर्वथा अतीत हो जाता है। देहपातके बाद तो प्रारब्धका भी क्षय हो जानेसे वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। सम्बन्ध-यदि ज्ञानीके पूर्वकृत और आगे होनेवाले सभी पुण्य-पाप नष्ट हो जाते हैं और उनसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता है, तो उसका शरीर कैसे टिका रहता हे? क्योंकि शरीरकी स्थिति तो कर्मफल-भोगके लिये ही

सूत्र १५—१६ ] अध्याय ४ ३४५

सूत्र १५—१६ ] अध्याय ४ ३४५ हैं। यदि ज्ञान होनेके बाद शरीर न रहे तो ज्ञानका उपदेशक न रहनेके कारण सम्प्रदायपरम्परा नष्ट हो जायगी ? इसपर कहते हैं— अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॥ ४ । १ । १५ ॥ तु=किन्तु; अनारब्धकार्ये=जिनका फलभोगरूप कार्य आरम्भ नहीं हुआ है, ऐसे; पूर्वे=पूर्वकृत पुण्य और पाप; एव=ही नष्ट होते हैं; तदवधेः=क्योकि श्रुतिमे प्रारब्ध कर्म रहनेतक शरीरके रहनेकी अवधि निर्धारित की गयी है । व्याख्या—पूर्वसूत्रोमे श्रुति-प्रमाणसे जो पूर्वकृत पुण्यकर्म और पापकर्मोंका नाश बताया गया है, वह केवल उन्हीं कर्मोंका होता है जो कि अपना फल देनेके लिये तैयार नहीं हुए थे, सञ्चित-अवस्थामे ही एकत्र हो रहे थे । जिन प्रारब्ध कर्मोंका फल भोगनेके लिये उस विद्वान्‌को शरीर मिला है, उनका नाश नहीं बताया गया है; क्योकि ‘तस्य तावदेवं चिर यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ।’ ‘उसका तभीतक विलम्ब है, जबतक प्रारब्धका नाश होकर देहपात नहीं हो जाता । उसके बाद वह परमात्मामे विलीन हो जाता है ।’ (छा० उ० ६ । १४ । २ ) । इस प्रकार श्रुतिमें प्रारब्धक्षयपर्यन्त ज्ञानीके शरीरकी स्थिति बतायी गयी है । सम्बन्ध—जब ज्ञानीका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता, तब उसके लिये श्रुतिमें आजीवन अग्निहोत्रादि आश्रम-सम्बन्धी कर्मोंका विधान कैसे किया गया ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॥ ४ । १ । १६ ॥ अग्निहोत्रादि=आश्रमोपयोगी अग्निहोत्र आदि विहित कर्मोंके अनुष्ठानका विधान; तु=तो; तत्कार्याय=उन-उन विहित कर्मोंकी रक्षा करनेके लिये; एव= ही है; तद्दर्शनात्=यही श्रुतियो और स्मृतियोंमें देखा गया है । व्याख्या—ज्ञानी महापुरुषोंके लिये जो श्रुतिमे विधान किये हुए अपने आश्रम-सम्बन्धी अग्निहोत्रादि कर्म जीवनपर्यन्त करनेकी बात कही गयी है, ( ब्र० सू० ३ । ४ । ३२ ) वह कथन उन कर्मोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही है । अर्थात् साधारण जनता उसकी देखा-देखी कर्मोंका त्याग करके भ्रष्ट न हो; अपि तु अपने-अपने कर्मोंमें श्रद्धापूर्वक लगी रहे, इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये वैसा कहा गया है, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं। यह बात श्रुतियों और स्मृतियोमे भी देखी जाती है । श्रुतिमें तो जनक, अश्वपति, याज्ञवल्क्य आदि ज्ञानी महापुरुषोंके

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ दृष्टान्तसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेका विधान सिद्ध किया गया है और श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि 'हे पार्थ ! मेरे लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है, मुझे तीनों लोकोंमे किसी भी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति नहीं करनी है, तो भी मैं कर्मोंमें संलग्न रहता हूँ; क्योंकि यदि मैं कभी सावधानीके साथ कर्म न करूँ तो ये सब लोग मेरा अनुकरण करके नष्ट-भ्रष्ट हो जायें और मैं उनके नाशमे निमित्त बनूँ।' इत्यादि ( ३ । २२ से २४ ) । तथा यह भी कहा है कि 'विद्वान् पुरुष कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमे भेद उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं उन्हींकी भाँति कर्म करता हुआ उनको कर्मोंमे लगाये रक्खे।' ( ३ । २५ ) । 'यज्ञरक्षाके लिये किये जानेवाले कर्मोंसे भिन्न कर्मोंद्वारा ही यह मनुष्य बन्धनमे पड़ता है।' इत्यादि ( ३ । ९ ) । इस प्रकार श्रुति और स्मृतिप्रमाणोसे यही सिद्ध होता है कि विद्वान्‌के लिये कर्म करनेका कथन केवल लोकसंग्रहके लिये है। सम्बन्ध—आश्रमके लिये विहित कर्मोंके सिवा, अन्य कर्म उनके द्वारा किये जाते हैं या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ॥ ४ । १ । १७ ॥ अतः=इनसे; अन्यापि=भिन्न क्रिया भी; उभयोः=ज्ञानी और साधक दोनोंके लिये; हि=ही; एकेषाम्=किसी एक शाखावालोके मतमे विहित है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा है, 'आजीवन शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए ही इस लोकमें सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करे।' इत्यादि ( ईशा० २ ) 'तथा जो कर्म और ज्ञान—इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह कर्मोंद्वारा मृत्युसे तरकर ज्ञानसे अमृतको प्राप्त होता है।' ( ईशा० ११ ) इस प्रकार किसी- किसी शाखावालोके मतमें ज्ञानी और साधक दोनोके लिये ही इन आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंके सिवा अन्य सभी विहित कर्मोंका अनुष्ठान आजीवन करते रहनेका विधान है। अतः ज्ञानी लोकसंग्रहके लिये प्रत्येक शुभ कर्मका अनुष्ठान कर्तापनके अहंकारसे रहित तथा कर्मासक्ति और फलासक्तिसे सर्वथा अतीत हुआ कर सकता है; क्योंकि ज्ञानोत्तरकालमे किये जानेवाले किसी भी कर्मसे उसका लेप नहीं होता। ( गीता ४ । २२; १८ । १७ ) । सम्बन्ध—क्या विद्या और कर्मके समुच्चयका भी श्रुतिमें विधान है ? इसपर कहते हैं—

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ४ ३४७

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ४ ३४७ यदेव विद्ययेति हि ॥ ४ । १ । १८ ॥ यत्=जो; एव=भी; विद्यया=विद्याके सहित ( किया जाता है ); इति= इस प्रकार कथन करनेवाली श्रुति है; हि=इसलिये ( विद्या कर्मोंका अङ्ग किसी जगह हो सकती है ) । व्याख्या-श्रुतिमे कहा है कि 'जो कर्म विद्या, श्रद्धा और रहस्यज्ञानके सहित किया जाता है. वह अधिक सामर्थ्यसम्पन्न हो जाता है।' ( छा० उ० १ । १ । १० ) यह श्रुति कर्मोंके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी उपासनाके प्रकरणकी है, इसलिये इसका सम्बन्ध वैसी ही उपासनाओसे है । तथा यह विद्या भी ब्रह्मविद्या नहीं है । अत. ज्ञानीसे या परमात्माकी प्राप्तिके लिये अभ्यास करनेवाले अन्य उपासकोंसे इस श्रुतिका सम्बन्ध नहीं है । इसलिये यह सिद्ध होता है कि उस प्रकारकी उपासनामे कही हुई विद्या ही उन कर्मोंका अङ्ग हो सकती है, ब्रह्मविद्या नहीं । सम्बन्ध-ज्ञानीके प्रारब्ध-कर्मोंका नाश कैसे होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते ॥ ४ । १ । १९ ॥ इतरे=सञ्चित और क्रियमाणके सिवा दूसरे प्रारब्धरूप शुभाशुभ कर्मोंको; तु=तो; भोगेन=उपभोगके द्वारा; क्षपयित्वा=क्षीण करके; संपद्यते=( वह ज्ञानी ) परमात्माको प्राप्त हो जाता है । व्याख्या-ऊपर कहा जा चुका है कि विद्वानके पूर्वकृत सञ्चित कर्म तो भस्म हो जाते हैं और क्रियमाण कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता; शेष रहे शुभाशुभ प्रारब्ध कर्म, उन दोनोंका उपभोगके द्वारा नाश करके ज्ञानी पुरुष परम पदको प्राप्त हो जाता है, यह बात श्रुतिमें कही गयी है ( छा० उ० ६ । १४ । २ ) । पहला पाद सम्पूर्ण ।

दूसरा पाद पहले पादमें उपासनाविषयक निर्णय करके जिन जीवन्मुक्त महापुरुषोंका ब्रह्मलोकादिमें गमन नहीं होता, उनको किस प्रकार परमात्माकी प्राप्ति होती है, इस विषयपर विचार किया गया। अब इस दूसरे पादमें, जो ब्रह्मविद्याके उपासक ब्रह्मलोकमें जाते हैं, उनकी गतिका प्रकार बताया जाता है। साधारण मनुष्यों- की और ब्रह्मविद्याके उपासककी गतिमें कहाँतक समानता है, यह स्पष्ट करनेके लिये पहले साधारण गतिके वर्णनसे प्रकरण आरम्भ किया जाता है— वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ ४ । २ । १ ॥ वाक्=वाणी; मनसि=मनमे स्थित हो जाती है; दर्शनात्=प्रत्यक्ष देखनेसे; च=और; शब्दात्=वेद-वाणीसे भी यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतिमे यह कहा गया है कि—'अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्।' 'इस मनुष्यके मरकर एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाते समय वाणी मनमे स्थित होती है, मन प्राणमे और प्राण तेजमे तथा तेज परदेवतामे स्थित होता है।' (छा० उ० ६ । ८ । ६) इस वाक्यमे जो वाणीका मनमे स्थित होना कहा गया है, वह वाक्-इन्द्रियका ही स्थित होना है, केवल उसकी वृत्तिमात्रका नहीं; क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मरणासन्न मनुष्यमे मन विद्यमान रहते हुए ही वाक्-इन्द्रिय- का कार्य बंद हो जाता है तथा श्रुतिमे तो स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही ही है। सम्बन्ध—'वाणी मनमें स्थित हो जाती है', यह कहनेके बाद वहाँ अन्य इन्द्रियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा गया। केवल मनकी प्राणमे स्थिति बतायी गयी, अतः अन्य इन्द्रियोंके विषयमें क्या समझना चाहिये ? इसपर कहते हैं— अत एव च सर्वाण्यनु ॥ ४ । २ । २ ॥ अत एव=इसीसे; च=यह भी (समझ लेना चाहिये कि); अनु=उनके साथ-साथ; सर्वाणि=समस्त इन्द्रियाँ (मनमें स्थित हो जाती हैं)। व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्मे कहा है कि—'तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भव- मिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः।' 'अर्थात् जिसके शरीरकी गरमी शान्त हो चुकी है,

सूत्र १—४ ] अध्याय ४ ३४९

सूत्र १—४ ] अध्याय ४ ३४९ ऐसा जीवात्मा मनमे स्थित हुई इन्द्रियोके सहित पुनर्जन्मको प्राप्त होता है।' ( प्र० उ० ३ । ९) इस प्रकार श्रुतिमे किसी एक इन्द्रियका मनमे स्थित होना न कहकर समस्त इन्द्रियोकी मनमे स्थिति बतायी गयी है तथा सभी इन्द्रियोके कर्मोंका बंद होना प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः पूर्वोक्त दोनो प्रमाणोंसे ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ अन्य इन्द्रियाँ भी 'मनमे स्थित हो जाती है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ ४ । २ । ३ ॥ उत्तरात्=उसके बादके कथनसे ( यह स्पष्ट है कि ), तत्=वह ( इन्द्रियोके सहित ); मनः=मन; प्राणे=प्राणमे ( स्थित हो जाता है ) । व्याख्या—पूर्वोक्त श्रुतिमे जो दूसरा वाक्य है, 'मनः प्राणे' ( छा० उ० ६ । ८ । ६ ) उसमे यह भी स्पष्ट है कि वह मन इन्द्रियोंके साथ ही प्राणमे स्थित हो जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४ । २ । ४ ॥ तदुपगमादिभ्यः=उस जीवात्माके गमन आदिके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि; सः=वह प्राण, मन और इन्द्रियोंके साथ; अध्यक्षे=अपने स्वामी जीवात्मामें ( स्थित हो जाता है ) । व्याख्या—बृहदारण्यकमे कहा है कि 'उस समय यह आत्मा नेत्रसे या ब्रह्मरन्ध्रसे अथवा शरीरके अन्य किसी मार्गद्वारा शरीरसे बाहर निकलता है, उसके निकलनेपर उसीके साथ प्राण भी निकलता है और प्राणके निकलनेपर उसके साथ सब इन्द्रियाँ निकलती है।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २ )। श्रुतिके इस गमनविषयक वाक्यसे यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रिय और मनसहित प्राण अपने स्वामी जीवात्मामें स्थित होता है। यद्यपि पूर्व श्रुतिमे प्राणका तेजमें स्थित होना कहा है, किन्तु बिना जीवात्माके केवल प्राण और मनसहित इन्द्रियोंका गमन सम्भव नहीं; इसलिये दूसरी श्रुतिमे कहे हुए जीवात्माको भी यहाँ सम्मिलित कर लेना उचित है।

प्रकरणमे पृथिवी, जल और तेज—इन तीन तत्त्वोकी उत्पत्तिका वर्णन करके

३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध-उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ४ । २ । ५ ॥ तच्छ्रुतेः=तद्विषयक श्रुति-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि; भूतेषु=( प्राण और मन-इन्द्रियसहित जीवात्मा ) पाँचो सूक्ष्म भूतोमे ( स्थित होता है ) । व्याख्या-पूर्वश्रुतिमें जो यह कहा है कि प्राण तेजमे स्थित होता है, उससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा, मन और समस्त इन्द्रियाँ—ये सब-के-सब सूक्ष्मभूत-समुदायमे स्थित होते हैं, क्योकि सभी सूक्ष्मभूत तेजके साथ मिले हुए हैं। अतः तेजके नामसे समस्त सूक्ष्मभूत-समुदायका ही कथन है । सम्बन्ध-पूर्व श्रुतिमें प्राणका केवल तेजमें ही स्थित होना कहा गया है, ' अतः यदि सब भूतोंमें स्थित होना न मानकर एक तेजस्तत्त्वमें ही स्थित होना मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ४ । २ । ६ ॥ एकस्मिन्=एक तेजस्तत्त्वमे स्थित होना; न=नहीं माना जा सकता; हि=क्योकि; दर्शयतः=श्रुति और स्मृति दोनो जीवात्माका पाँचो भूतोसे युक्त होना दिखलाती हैं । व्याख्या-इस बातका निर्णय पहले ( ब्रह्मसूत्र ३ । १ । २ मे ) कर दिया गया है कि एक जल या एक तेजके कथनसे पाँचो तत्त्वोंका ग्रहण है; क्योकि उस प्रकरणमे पृथिवी, जल और तेज—इन तीन तत्त्वोकी उत्पत्तिका वर्णन करके तीनोका मिश्रण करनेकी बात कही है । अतः जिस तत्त्वकी प्रधानता है, उसीके नामसे वहाँ वे तीनो तत्त्व पुकारे गये है; इससे, शरीर पाञ्चभौतिक है, यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देनेसे तथा श्रुतिमे भी पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय ( बृह० उ० ४ । ४ । ५ )—इन विशेषणोका जीवात्माके साथ प्रयोग देखा जानेसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके सहित जीवात्मा एकमात्र तेजस्तत्त्वमे स्थित नहीं होता; अपि तु शरीरके बीजभूत पाँचो भूतोके सूक्ष्म स्वरूपमें स्थित होता है । वही इसका सूक्ष्म शरीर है, जो कि कठोपनिषद्में रथके नामसे कहा गया है ( क० उ० १ । ३ । ३) । इसके सिवा स्मृतिमें भी कहा है—