ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आसीनः सम्भवात् ॥ ४ । १ । ७ ॥ आसीनः=बैठे हुए ही ( उपासना करनी चाहिये ); सम्भवात्=क्योंकि बैठकर ही निर्विघ्न उपासना करना सम्भव है । व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरका जैसा रूप सुनने और विचार करनेपर समझमें आया है, उसका बार-बार तैलधाराकी भाँति निरन्तर चिन्तन करते रहनेका नाम उपासना है । यह उपासना चलते-फिरते या अन्य शरीरसम्बन्धी काम करते समय नहीं हो सकती; क्योंकि उस समय चित्त विक्षिप्त रहता है तथा सोते हुए करनेमें भी निद्रारूप विघ्नका आना स्वाभाविक है; अतः केवल बैठकर करनेसे ही निर्विघ्न उपासना हो सकती है । इसलिये उपासनाका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है कि 'उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ।' अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तः- करणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे ।' ( गीता ६ । १२ ) । सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥ ध्यानात्=उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये ) । व्याख्या—अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है ( मु० उ० ३ । १ । ८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है । अतएव यह बैठकर ही किया जा सकता है, चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता । सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४ । १ । ९ ॥ च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=रखते हुए ध्यान करनेका उपदेश है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ 'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि सिर, ग्रीवा और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और स्थिर करके समस्त