भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ७-११ ] अध्याय ४ ३४१ इन्द्रियोंको मनके द्वारा हृदयमे निरुद्ध करके ॐकाररूप नौकाद्वारा समस्त भय- दायक जन्मान्तररूप स्रोतोसे तर जाय ।' ( श्वेता० उ० २ । ८ ) । इस श्रुतिसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उपासनाके लिये शरीरकी भी अचलता आवश्यक है, इसलिये भी उपासना बैठकर ही की जानी चाहिये । सम्बन्ध—उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे दृढ करते हैं— स्मरन्ति च ॥ ४ । १ । १० ॥ च=तथा; स्मरन्ति=ऐसा ही स्मरण करते हैं । व्याख्या—स्मृतिमे भी यही बात कही गयी है— समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ 'काया, शिर और ग्रीवाको सम और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि लगाकर, अन्य दिशाओको न देखता हुआ निर्भय होकर, भलीभाँति विक्षेपरहित, शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्यव्रतमे स्थित रहते हुए, मनको वशमें करके, मुझमे चित्त लगाये हुए, मुझे ही अपना परम प्राप्य मानकर साधन करनेके लिये बैठे ।' ( गीता ६ । १३-१४ ) । इस प्रकार स्मृति-प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है कि परम प्राप्य परमात्माके निरन्तर चिन्तनरूप ध्यानका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । सम्बन्ध—उक्त साधन कैसे स्थानमें बैठकर करना चाहिये ? इस जिज्ञासा- पर कहते हैं— यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ४ । १ । ११ ॥ अविशेषात्=किसी विशेष स्थान या दिशाका विधान न होनेके कारण ( यही सिद्ध होता है कि ); यत्र=जहाँ; एकाग्रता=चित्तकी एकाग्रता ( सुगमतासे हो सके ); तत्र=वहीं ( बैठकर ध्यानका अभ्यास करे ) । व्याख्या—श्रुतिमे कहा है कि—