ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सटता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त परमात्माको जाननेवाले महापुरुषमें पापकर्म लिप्त नहीं होते हैं।' (छा० उ० ४ । १४ । ३)। इस प्रकार श्रुतिके द्वारा ज्ञानोत्तरकालमे होनेवाले पापकर्मोंसे ज्ञानीका अलिप्त रहना कहा गया है तथा यह दृष्टान्त भी दिया गया है, 'जिस प्रकार सरकंडेकी सींकके अग्रभागमे रहनेवाली तुला अग्निमे गिराय़ी जानेपर तत्काल भस्म हो जाती है, इसी प्रकार इस ज्ञानीके समस्त पाप निःसन्देह भस्म हो जाते हैं।' (छा० उ० ५ । २४ । ३)। मुण्डक (२।२।८) और गीता (४ । ३७) मे भी ऐसा ही कहा गया है। इस प्रकार श्रुतियो और स्मृतियोमे ब्रह्मज्ञानके बाद लोकसंग्रहके लिये की जानेवाली व्यावहारिक चेष्टामे होनेवाले आनुषंगिक पापोका उसके साथ सम्बन्ध न होना और पूर्वकृत पापोका ,सर्वथा नष्ट हो जाना बताया जानेके कारण यही निश्चय होता है कि परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके बाद उस सिद्ध पुरुषके पूर्वकृत पापोका सर्वथा नाश हो जाता है और आगे होनेवाले पापोंसे उसका कभी सम्पर्क नहीं होता। सम्बन्ध-भगवत्प्राप्त पुरुषके पुण्यकर्मोंका क्या होता हे? इस जिज्ञासापर कहते हैं— इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ॥ ४ । १ । १४ ॥ इतरस्य=पुण्यकर्मसमुदायका; अपि=भी; एवम्=इसी प्रकार; असंश्लेषः= सम्बन्ध न होना और नाश हो जाना समझना चाहिये; पाते तु=देहपात होनेपर तो वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। व्याख्या-'यह पुण्य और पाप इन दोनोसे ही निःसन्देह तर जाता है।', (बृह० उ० ४ । ४ । २२) इस प्रकार श्रुतिमे कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि पाप-कर्मकी भाँति ही पूर्वकृत और आगे होनेवाले पुण्यकर्मोंसे भी जीवन्मुक्त अवस्थामे उस ज्ञानीका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, वह समस्त कर्मोंसे सर्वथा अतीत हो जाता है। देहपातके बाद तो प्रारब्धका भी क्षय हो जानेसे वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। सम्बन्ध-यदि ज्ञानीके पूर्वकृत और आगे होनेवाले सभी पुण्य-पाप नष्ट हो जाते हैं और उनसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता है, तो उसका शरीर कैसे टिका रहता हे? क्योंकि शरीरकी स्थिति तो कर्मफल-भोगके लिये ही