भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र १२-१३ ] अध्याय ४ ३४३ का निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमे पहुँचता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीका त्याग कर देता है, ठीक उसी प्रकार, वह पापोंसे मुक्त होकर, सामवेदकी श्रुतियोंके अभिमानी देवताओंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है। वहाँ वह इस जीवघनरूप हिरण्यगर्भसे अत्यन्त श्रेष्ठ तथा सबके हृदयमे शयन करनेवाले परमपुरुषका साक्षात्कार करता है।' (प्र० उ० ५।५)। इस प्रकार मृत्युपर्यन्त निरन्तर उपासना करते रहनेका श्रुतिमे विधान होनेके कारण यही मानना उचित है कि आजीवन नित्य-निरन्तर उपासना करते रहना चाहिये। जिसको जीवनकालमें ही उस परमपुरुषका साक्षात्कार हो जाता है, उसका तो उस परमेश्वरमे कभी वियोग होता ही नहीं है, वह तो स्वभावसे ही उसमे संयुक्त हो जाता है। तथापि वह जो मरणपर्यन्त निरन्तर उपासना करता रहता है, वह उसके अन्य कर्मोंकी भाँति लोकसंग्रहके लिये है। परन्तु साधकके लिये तो मृत्युपर्यन्त उपासना परम आवश्यक है। अन्यथा योगभ्रष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म अनिवार्य हो जाता है (गीता ६। ३७ से ४०)। इसीलिये भगवान्ने मरण- पर्यन्त साधन करते रहनेके लिये जगह-जगह कहा है (गीता २।७२; ७। ३०; ८। ५; ८। ८, ९, १०, १२, १३ इत्यादि)। सम्बन्ध—यहाँतक उपासनाविषयक वर्णनकी समाप्ति करके अब परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले साधनोंके फलके सम्बन्धमे विचार आरम्भ किया जाता है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जिसको जीवनकालमें ही परमात्मा- की प्राप्ति हो जाती है, उसके पूर्वार्जित तथा भावी पुण्य-पापरूप कर्मोंका क्या होता है? इसपर कहते हैं— तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्य- पदेशात् ॥ ४ । १ । १३ ॥ तदधिगमे = उस परब्रह्म परमात्माके प्राप्त हो जानेपर; उत्तरपूर्वाघयोः = आगे होनेवाले और पहलेके किये हुए पापोंका; अश्लेषविनाशौ = क्रमशः असम्पर्क एव नाश होता है; तद्व्यपदेशात् = क्योकि श्रुतिमे यही बात जगह-जगह कही गयी है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि 'यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एव- मेवंविदि पापं कर्म न लिप्यते।' अर्थात् 'जिस प्रकार कमलके पत्तेमे जल नहीं