भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

३४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सटता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त परमात्माको जाननेवाले महापुरुषमें पापकर्म लिप्त नहीं होते हैं।' (छा० उ० ४ । १४ । ३)। इस प्रकार श्रुतिके द्वारा ज्ञानोत्तरकालमे होनेवाले पापकर्मोंसे ज्ञानीका अलिप्त रहना कहा गया है तथा यह दृष्टान्त भी दिया गया है, 'जिस प्रकार सरकंडेकी सींकके अग्रभागमे रहनेवाली तुला अग्निमे गिराय़ी जानेपर तत्काल भस्म हो जाती है, इसी प्रकार इस ज्ञानीके समस्त पाप निःसन्देह भस्म हो जाते हैं।' (छा० उ० ५ । २४ । ३)। मुण्डक (२।२।८) और गीता (४ । ३७) मे भी ऐसा ही कहा गया है। इस प्रकार श्रुतियो और स्मृतियोमे ब्रह्मज्ञानके बाद लोकसंग्रहके लिये की जानेवाली व्यावहारिक चेष्टामे होनेवाले आनुषंगिक पापोका उसके साथ सम्बन्ध न होना और पूर्वकृत पापोका ,सर्वथा नष्ट हो जाना बताया जानेके कारण यही निश्चय होता है कि परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके बाद उस सिद्ध पुरुषके पूर्वकृत पापोका सर्वथा नाश हो जाता है और आगे होनेवाले पापोंसे उसका कभी सम्पर्क नहीं होता। सम्बन्ध-भगवत्प्राप्त पुरुषके पुण्यकर्मोंका क्या होता हे? इस जिज्ञासापर कहते हैं— इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ॥ ४ । १ । १४ ॥ इतरस्य=पुण्यकर्मसमुदायका; अपि=भी; एवम्=इसी प्रकार; असंश्लेषः= सम्बन्ध न होना और नाश हो जाना समझना चाहिये; पाते तु=देहपात होनेपर तो वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। व्याख्या-'यह पुण्य और पाप इन दोनोसे ही निःसन्देह तर जाता है।', (बृह० उ० ४ । ४ । २२) इस प्रकार श्रुतिमे कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि पाप-कर्मकी भाँति ही पूर्वकृत और आगे होनेवाले पुण्यकर्मोंसे भी जीवन्मुक्त अवस्थामे उस ज्ञानीका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, वह समस्त कर्मोंसे सर्वथा अतीत हो जाता है। देहपातके बाद तो प्रारब्धका भी क्षय हो जानेसे वह परमात्माको प्राप्त हो ही जाता है। सम्बन्ध-यदि ज्ञानीके पूर्वकृत और आगे होनेवाले सभी पुण्य-पाप नष्ट हो जाते हैं और उनसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता है, तो उसका शरीर कैसे टिका रहता हे? क्योंकि शरीरकी स्थिति तो कर्मफल-भोगके लिये ही

सूत्र १५—१६ ] अध्याय ४ ३४५

सूत्र १५—१६ ] अध्याय ४ ३४५ हैं। यदि ज्ञान होनेके बाद शरीर न रहे तो ज्ञानका उपदेशक न रहनेके कारण सम्प्रदायपरम्परा नष्ट हो जायगी ? इसपर कहते हैं— अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॥ ४ । १ । १५ ॥ तु=किन्तु; अनारब्धकार्ये=जिनका फलभोगरूप कार्य आरम्भ नहीं हुआ है, ऐसे; पूर्वे=पूर्वकृत पुण्य और पाप; एव=ही नष्ट होते हैं; तदवधेः=क्योकि श्रुतिमे प्रारब्ध कर्म रहनेतक शरीरके रहनेकी अवधि निर्धारित की गयी है । व्याख्या—पूर्वसूत्रोमे श्रुति-प्रमाणसे जो पूर्वकृत पुण्यकर्म और पापकर्मोंका नाश बताया गया है, वह केवल उन्हीं कर्मोंका होता है जो कि अपना फल देनेके लिये तैयार नहीं हुए थे, सञ्चित-अवस्थामे ही एकत्र हो रहे थे । जिन प्रारब्ध कर्मोंका फल भोगनेके लिये उस विद्वान्‌को शरीर मिला है, उनका नाश नहीं बताया गया है; क्योकि ‘तस्य तावदेवं चिर यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ।’ ‘उसका तभीतक विलम्ब है, जबतक प्रारब्धका नाश होकर देहपात नहीं हो जाता । उसके बाद वह परमात्मामे विलीन हो जाता है ।’ (छा० उ० ६ । १४ । २ ) । इस प्रकार श्रुतिमें प्रारब्धक्षयपर्यन्त ज्ञानीके शरीरकी स्थिति बतायी गयी है । सम्बन्ध—जब ज्ञानीका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता, तब उसके लिये श्रुतिमें आजीवन अग्निहोत्रादि आश्रम-सम्बन्धी कर्मोंका विधान कैसे किया गया ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॥ ४ । १ । १६ ॥ अग्निहोत्रादि=आश्रमोपयोगी अग्निहोत्र आदि विहित कर्मोंके अनुष्ठानका विधान; तु=तो; तत्कार्याय=उन-उन विहित कर्मोंकी रक्षा करनेके लिये; एव= ही है; तद्दर्शनात्=यही श्रुतियो और स्मृतियोंमें देखा गया है । व्याख्या—ज्ञानी महापुरुषोंके लिये जो श्रुतिमे विधान किये हुए अपने आश्रम-सम्बन्धी अग्निहोत्रादि कर्म जीवनपर्यन्त करनेकी बात कही गयी है, ( ब्र० सू० ३ । ४ । ३२ ) वह कथन उन कर्मोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही है । अर्थात् साधारण जनता उसकी देखा-देखी कर्मोंका त्याग करके भ्रष्ट न हो; अपि तु अपने-अपने कर्मोंमें श्रद्धापूर्वक लगी रहे, इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये वैसा कहा गया है, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं। यह बात श्रुतियों और स्मृतियोमे भी देखी जाती है । श्रुतिमें तो जनक, अश्वपति, याज्ञवल्क्य आदि ज्ञानी महापुरुषोंके

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ दृष्टान्तसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेका विधान सिद्ध किया गया है और श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि 'हे पार्थ ! मेरे लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है, मुझे तीनों लोकोंमे किसी भी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति नहीं करनी है, तो भी मैं कर्मोंमें संलग्न रहता हूँ; क्योंकि यदि मैं कभी सावधानीके साथ कर्म न करूँ तो ये सब लोग मेरा अनुकरण करके नष्ट-भ्रष्ट हो जायें और मैं उनके नाशमे निमित्त बनूँ।' इत्यादि ( ३ । २२ से २४ ) । तथा यह भी कहा है कि 'विद्वान् पुरुष कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमे भेद उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं उन्हींकी भाँति कर्म करता हुआ उनको कर्मोंमे लगाये रक्खे।' ( ३ । २५ ) । 'यज्ञरक्षाके लिये किये जानेवाले कर्मोंसे भिन्न कर्मोंद्वारा ही यह मनुष्य बन्धनमे पड़ता है।' इत्यादि ( ३ । ९ ) । इस प्रकार श्रुति और स्मृतिप्रमाणोसे यही सिद्ध होता है कि विद्वान्‌के लिये कर्म करनेका कथन केवल लोकसंग्रहके लिये है। सम्बन्ध—आश्रमके लिये विहित कर्मोंके सिवा, अन्य कर्म उनके द्वारा किये जाते हैं या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ॥ ४ । १ । १७ ॥ अतः=इनसे; अन्यापि=भिन्न क्रिया भी; उभयोः=ज्ञानी और साधक दोनोंके लिये; हि=ही; एकेषाम्=किसी एक शाखावालोके मतमे विहित है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा है, 'आजीवन शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए ही इस लोकमें सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करे।' इत्यादि ( ईशा० २ ) 'तथा जो कर्म और ज्ञान—इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह कर्मोंद्वारा मृत्युसे तरकर ज्ञानसे अमृतको प्राप्त होता है।' ( ईशा० ११ ) इस प्रकार किसी- किसी शाखावालोके मतमें ज्ञानी और साधक दोनोके लिये ही इन आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंके सिवा अन्य सभी विहित कर्मोंका अनुष्ठान आजीवन करते रहनेका विधान है। अतः ज्ञानी लोकसंग्रहके लिये प्रत्येक शुभ कर्मका अनुष्ठान कर्तापनके अहंकारसे रहित तथा कर्मासक्ति और फलासक्तिसे सर्वथा अतीत हुआ कर सकता है; क्योंकि ज्ञानोत्तरकालमे किये जानेवाले किसी भी कर्मसे उसका लेप नहीं होता। ( गीता ४ । २२; १८ । १७ ) । सम्बन्ध—क्या विद्या और कर्मके समुच्चयका भी श्रुतिमें विधान है ? इसपर कहते हैं—

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ४ ३४७

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ४ ३४७ यदेव विद्ययेति हि ॥ ४ । १ । १८ ॥ यत्=जो; एव=भी; विद्यया=विद्याके सहित ( किया जाता है ); इति= इस प्रकार कथन करनेवाली श्रुति है; हि=इसलिये ( विद्या कर्मोंका अङ्ग किसी जगह हो सकती है ) । व्याख्या-श्रुतिमे कहा है कि 'जो कर्म विद्या, श्रद्धा और रहस्यज्ञानके सहित किया जाता है. वह अधिक सामर्थ्यसम्पन्न हो जाता है।' ( छा० उ० १ । १ । १० ) यह श्रुति कर्मोंके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी उपासनाके प्रकरणकी है, इसलिये इसका सम्बन्ध वैसी ही उपासनाओसे है । तथा यह विद्या भी ब्रह्मविद्या नहीं है । अत. ज्ञानीसे या परमात्माकी प्राप्तिके लिये अभ्यास करनेवाले अन्य उपासकोंसे इस श्रुतिका सम्बन्ध नहीं है । इसलिये यह सिद्ध होता है कि उस प्रकारकी उपासनामे कही हुई विद्या ही उन कर्मोंका अङ्ग हो सकती है, ब्रह्मविद्या नहीं । सम्बन्ध-ज्ञानीके प्रारब्ध-कर्मोंका नाश कैसे होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते ॥ ४ । १ । १९ ॥ इतरे=सञ्चित और क्रियमाणके सिवा दूसरे प्रारब्धरूप शुभाशुभ कर्मोंको; तु=तो; भोगेन=उपभोगके द्वारा; क्षपयित्वा=क्षीण करके; संपद्यते=( वह ज्ञानी ) परमात्माको प्राप्त हो जाता है । व्याख्या-ऊपर कहा जा चुका है कि विद्वानके पूर्वकृत सञ्चित कर्म तो भस्म हो जाते हैं और क्रियमाण कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता; शेष रहे शुभाशुभ प्रारब्ध कर्म, उन दोनोंका उपभोगके द्वारा नाश करके ज्ञानी पुरुष परम पदको प्राप्त हो जाता है, यह बात श्रुतिमें कही गयी है ( छा० उ० ६ । १४ । २ ) । पहला पाद सम्पूर्ण ।

दूसरा पाद पहले पादमें उपासनाविषयक निर्णय करके जिन जीवन्मुक्त महापुरुषोंका ब्रह्मलोकादिमें गमन नहीं होता, उनको किस प्रकार परमात्माकी प्राप्ति होती है, इस विषयपर विचार किया गया। अब इस दूसरे पादमें, जो ब्रह्मविद्याके उपासक ब्रह्मलोकमें जाते हैं, उनकी गतिका प्रकार बताया जाता है। साधारण मनुष्यों- की और ब्रह्मविद्याके उपासककी गतिमें कहाँतक समानता है, यह स्पष्ट करनेके लिये पहले साधारण गतिके वर्णनसे प्रकरण आरम्भ किया जाता है— वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ ४ । २ । १ ॥ वाक्=वाणी; मनसि=मनमे स्थित हो जाती है; दर्शनात्=प्रत्यक्ष देखनेसे; च=और; शब्दात्=वेद-वाणीसे भी यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतिमे यह कहा गया है कि—'अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्।' 'इस मनुष्यके मरकर एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाते समय वाणी मनमे स्थित होती है, मन प्राणमे और प्राण तेजमे तथा तेज परदेवतामे स्थित होता है।' (छा० उ० ६ । ८ । ६) इस वाक्यमे जो वाणीका मनमे स्थित होना कहा गया है, वह वाक्-इन्द्रियका ही स्थित होना है, केवल उसकी वृत्तिमात्रका नहीं; क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मरणासन्न मनुष्यमे मन विद्यमान रहते हुए ही वाक्-इन्द्रिय- का कार्य बंद हो जाता है तथा श्रुतिमे तो स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही ही है। सम्बन्ध—'वाणी मनमें स्थित हो जाती है', यह कहनेके बाद वहाँ अन्य इन्द्रियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा गया। केवल मनकी प्राणमे स्थिति बतायी गयी, अतः अन्य इन्द्रियोंके विषयमें क्या समझना चाहिये ? इसपर कहते हैं— अत एव च सर्वाण्यनु ॥ ४ । २ । २ ॥ अत एव=इसीसे; च=यह भी (समझ लेना चाहिये कि); अनु=उनके साथ-साथ; सर्वाणि=समस्त इन्द्रियाँ (मनमें स्थित हो जाती हैं)। व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्मे कहा है कि—'तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भव- मिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः।' 'अर्थात् जिसके शरीरकी गरमी शान्त हो चुकी है,

सूत्र १—४ ] अध्याय ४ ३४९

सूत्र १—४ ] अध्याय ४ ३४९ ऐसा जीवात्मा मनमे स्थित हुई इन्द्रियोके सहित पुनर्जन्मको प्राप्त होता है।' ( प्र० उ० ३ । ९) इस प्रकार श्रुतिमे किसी एक इन्द्रियका मनमे स्थित होना न कहकर समस्त इन्द्रियोकी मनमे स्थिति बतायी गयी है तथा सभी इन्द्रियोके कर्मोंका बंद होना प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः पूर्वोक्त दोनो प्रमाणोंसे ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ अन्य इन्द्रियाँ भी 'मनमे स्थित हो जाती है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ ४ । २ । ३ ॥ उत्तरात्=उसके बादके कथनसे ( यह स्पष्ट है कि ), तत्=वह ( इन्द्रियोके सहित ); मनः=मन; प्राणे=प्राणमे ( स्थित हो जाता है ) । व्याख्या—पूर्वोक्त श्रुतिमे जो दूसरा वाक्य है, 'मनः प्राणे' ( छा० उ० ६ । ८ । ६ ) उसमे यह भी स्पष्ट है कि वह मन इन्द्रियोंके साथ ही प्राणमे स्थित हो जाता है। सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४ । २ । ४ ॥ तदुपगमादिभ्यः=उस जीवात्माके गमन आदिके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि; सः=वह प्राण, मन और इन्द्रियोंके साथ; अध्यक्षे=अपने स्वामी जीवात्मामें ( स्थित हो जाता है ) । व्याख्या—बृहदारण्यकमे कहा है कि 'उस समय यह आत्मा नेत्रसे या ब्रह्मरन्ध्रसे अथवा शरीरके अन्य किसी मार्गद्वारा शरीरसे बाहर निकलता है, उसके निकलनेपर उसीके साथ प्राण भी निकलता है और प्राणके निकलनेपर उसके साथ सब इन्द्रियाँ निकलती है।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २ )। श्रुतिके इस गमनविषयक वाक्यसे यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रिय और मनसहित प्राण अपने स्वामी जीवात्मामें स्थित होता है। यद्यपि पूर्व श्रुतिमे प्राणका तेजमें स्थित होना कहा है, किन्तु बिना जीवात्माके केवल प्राण और मनसहित इन्द्रियोंका गमन सम्भव नहीं; इसलिये दूसरी श्रुतिमे कहे हुए जीवात्माको भी यहाँ सम्मिलित कर लेना उचित है।

प्रकरणमे पृथिवी, जल और तेज—इन तीन तत्त्वोकी उत्पत्तिका वर्णन करके

३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध-उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ४ । २ । ५ ॥ तच्छ्रुतेः=तद्विषयक श्रुति-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि; भूतेषु=( प्राण और मन-इन्द्रियसहित जीवात्मा ) पाँचो सूक्ष्म भूतोमे ( स्थित होता है ) । व्याख्या-पूर्वश्रुतिमें जो यह कहा है कि प्राण तेजमे स्थित होता है, उससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा, मन और समस्त इन्द्रियाँ—ये सब-के-सब सूक्ष्मभूत-समुदायमे स्थित होते हैं, क्योकि सभी सूक्ष्मभूत तेजके साथ मिले हुए हैं। अतः तेजके नामसे समस्त सूक्ष्मभूत-समुदायका ही कथन है । सम्बन्ध-पूर्व श्रुतिमें प्राणका केवल तेजमें ही स्थित होना कहा गया है, ' अतः यदि सब भूतोंमें स्थित होना न मानकर एक तेजस्तत्त्वमें ही स्थित होना मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ४ । २ । ६ ॥ एकस्मिन्=एक तेजस्तत्त्वमे स्थित होना; न=नहीं माना जा सकता; हि=क्योकि; दर्शयतः=श्रुति और स्मृति दोनो जीवात्माका पाँचो भूतोसे युक्त होना दिखलाती हैं । व्याख्या-इस बातका निर्णय पहले ( ब्रह्मसूत्र ३ । १ । २ मे ) कर दिया गया है कि एक जल या एक तेजके कथनसे पाँचो तत्त्वोंका ग्रहण है; क्योकि उस प्रकरणमे पृथिवी, जल और तेज—इन तीन तत्त्वोकी उत्पत्तिका वर्णन करके तीनोका मिश्रण करनेकी बात कही है । अतः जिस तत्त्वकी प्रधानता है, उसीके नामसे वहाँ वे तीनो तत्त्व पुकारे गये है; इससे, शरीर पाञ्चभौतिक है, यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देनेसे तथा श्रुतिमे भी पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय ( बृह० उ० ४ । ४ । ५ )—इन विशेषणोका जीवात्माके साथ प्रयोग देखा जानेसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके सहित जीवात्मा एकमात्र तेजस्तत्त्वमे स्थित नहीं होता; अपि तु शरीरके बीजभूत पाँचो भूतोके सूक्ष्म स्वरूपमें स्थित होता है । वही इसका सूक्ष्म शरीर है, जो कि कठोपनिषद्में रथके नामसे कहा गया है ( क० उ० १ । ३ । ३) । इसके सिवा स्मृतिमें भी कहा है—

सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ३५१

सूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ३५१ अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः । ताभिः सार्धमिदं सर्वं संभवत्यनुपूर्वशः ॥ (मनु० १ । २७) 'पाँचों भूतोंकी जो विनाशशील पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ ( रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द ) कही गयी हैं, उनके साथ यह सम्पूर्ण जगत् क्रमशः उत्पन्न होता है ।' सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मरणकालकी गतिका जो वर्णन किया गया है, यह साधारण मनुष्योंके विषयमें है या ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले तत्त्ववेत्ताओंके विषयमें ? इसपर कहते हैं— समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ४ । २ । ७ ॥ आसृत्युपक्रमात्=देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमे जानेका क्रम आरम्भ होनेतक, समाना=दोनोंकी गति समान; च=ही है, च=क्योंकि; अनुपोष्य=सूक्ष्म शरीरको सुरक्षित रखकर ही; अमृतत्वम्=ब्रह्मलोकमे अमृतत्व लाभ करना ब्रह्मविद्याका फल बताया गया है । व्याख्या-वाणी मनमे स्थित होती है, यहाँसे लेकर प्राण, मन और इन्द्रियों- सहित जो जीवात्माके सूक्ष्म भूतसमुदायमे स्थित होनेतकका यानी स्थूल-शरीरसे निकलकर ब्रह्मलोकमे जानेका जो मार्ग बताया गया है, उसका आरम्भ होनेसे पहले साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मलोकमे जानेवाले ज्ञानी पुरुषकी गति एक समान ही बतायी गयी है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके सुरक्षित रहते हुए ही इस लोकसे ब्रह्म- लोकमे जाना होता है और वहाँ जाकर उसे अमृतस्वरूपकी प्राप्ति होती है । इसीलिये अलग-अलग वर्णन नहीं किया गया है । सम्बन्ध-उस प्रकरणके अन्तमें जो यह कहा गया है कि मन, इन्द्रियाँ और जीवात्माके सहित वह तेज परमदेवतामें स्थित होता है तो यह स्थित होना कैसा है; क्योंकि प्रकरण साधारण मनुष्योंका है, सभी समान भावसे परमदेव परमात्माको प्राप्त हो जायँ, यह सम्भव नहीं ! इस जिज्ञासापर कहते हैं— तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ४ । २ । ८ ॥ संसारव्यपदेशात्=साधारण जीवोंका मरनेके बाद बार-बार जन्म ग्रहण करनेका कथन होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); तत्=उनका वह सूक्ष्म

३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शरीर; आ अपीतेः=मुक्तावस्था प्राप्त होनेतक रहता है, इसलिये नूतन स्थूल शरीर प्राप्त होनेके पहले-पहले उनका परमात्मामें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है । व्याख्या—उस प्रकरणमें जो एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवालेको परम- देवतामें स्थित होना कहा गया है, वह प्रलयकालकी भाँति कर्म-संस्कार और सूक्ष्म शरीरके सहित अज्ञानपूर्वक स्थित होना है । अतः वह परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति नहीं है; किन्तु समस्त जगत् जिस प्रकार उस परम कारण परमात्मामें ही स्थित रहता है, उसी प्रकार स्थित होना है । यह स्थिति उस जीवात्माको जबतक अपने कर्मफल-उपभोगके उपयुक्त कोई दूसरा शरीर नहीं मिलता, तब तक रहती है; क्योकि उसके पुनर्जन्मका श्रुतिमें कथन है (क० उ० २ । २ । ७) । इसलिये जबतक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती, तबतक उसका सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध रहता है; अतः वह मुक्त पुरुषकी भाँति परमात्मामे विलीन नहीं होता । सम्बन्ध—उस प्रकरणमें तो जीवात्माका सबके सहित आकाशादि भूतोंमें स्थित होना बताया गया है, वहाँ यह नहीं कहा गया कि वह सूक्ष्मभूत- समुदायमें स्थित होता है; अतः उसे स्पष्ट करते हैं— सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥ ४ । २ । ६ ॥ प्रमाणतः=वेद-प्रमाणसे; च=और; तथोपलब्धेः=वैसी उपलब्धि होनेसे भी ( यही सिद्ध होता है कि ); सूक्ष्मम्=( जिसमें जीवात्मा स्थित होता है वह ) भूतसमुदाय सूक्ष्म है । व्याख्या—मरणकालमें जिस आकाशादि भूतसमुदायमे सबके सहित जीवात्माका स्थित होना कहा गया है, वह भूतसमुदाय सूक्ष्म है, स्थूल नहीं है—यह बात श्रुतिके प्रमाणसे तो ( सिद्ध है ही ) प्रत्यक्ष उपलब्धिसे भी सिद्ध होती है; क्योंकि श्रुतिमे जहाँ परलोक-गमनका वर्णन किया गया है, वहाँ कहा है— शतं चैका हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ 'इस जीवात्माके हृदयमें एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेसे एक कपालकी ओर निकली हुई है, इसीको सुषुम्णा कहते हैं, उसके द्वारा ऊपर जाकर मनुष्य अमृतभावको प्राप्त होता है, दूसरी नाडियाँ मरणकालमें नाना योनियोमे ले

सूत्र ९-११ ] अध्याय ४ ३५३

सूत्र ९-११ ] अध्याय ४ ३५३ जानेवाली होती हैं।' (छा० उ० ८। ६। ६) इसमें जो नाडीद्वारा निकल- कर जानेकी बात कही है, यह सूक्ष्म भूतोंमें स्थित जीवात्माके लिये ही सम्भव है; तथा मरणकालमे समीपवर्ती मनुष्योको उसका निकलना नेत्रेन्द्रिय आदिसे दिखलायी नहीं देता। इससे भी उन भूतोका सूक्ष्म होना प्रत्यक्ष है। इस प्रकार श्रुति- प्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणसे भी उस भूतसमुदायका सूक्ष्म होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं- नोपमर्देनातः ॥ ४ । २ । १० ॥ अतः=यह भूतसमुदाय सूक्ष्म होता है, इसीलिये; उपमर्देन=इस स्थूल- शरीरका दाह आदिके द्वारा नाश कर देनेसे; न=उसका नाश नहीं होता । व्याख्या-मरणकालमे जीवात्मा जिस आकाशादि भूत-समुदायरूप शरीरमें स्थित होता है, वह सूक्ष्म है; इसीलिये इस स्थूल शरीरका दाह आदिके द्वारा नाश कर देनेसे भी उस सूक्ष्म शरीरका कुछ नहीं बिगड़ता। जीवात्मा सूक्ष्म शरीरके साथ इस स्थूल शरीरसे निकल जाता है, इसीलिये इस स्थूल शरीरका दाह-संस्कार करनेपर भी जीवात्माको किसी प्रकारके कष्टका अनुभव नहीं होता। सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी ही पुष्टि करते हुए कहते हैं- अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा ॥ ४ । २ । ११ ॥ एषः=यह; ऊष्मा=गरमी (जो कि जीवित शरीरमें अनुभूत होती है); अस्य एव=इस सूक्ष्म शरीरकी ही है; उपपत्तेः=युक्तिसे; च=भी (यह बात सिद्ध होती है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके निकल जानेपर स्थूल शरीर गरम नहीं रहता)। व्याख्या-सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्मा जब इस स्थूल शरीरसे निकल जाता है, उसके बाद इसमें गरमी नहीं रहती, स्थूल शरीरके रूप आदि लक्षण वैसे- के-वैसे रहते हुए ही वह ठंडा हो जाता है। इस युक्तिसे भी यह बात समझी जा सकती है कि जीवित शरीरमे जिस गरमीका अनुभव होता है, वह इस सूक्ष्म शरीरकी ही है। अतएव इसके निकल जानेपर वह नहीं रहती। सम्बन्ध-जिनके समस्त संकल्प यहाँ नष्ट हो चुके हैं, जिनके मनमें किसी प्रकारकी वासना शेष नहीं रही, जिनको इसी शरीरमें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति ब्र० द० २३--

३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद हो गयी है, उनका ब्रह्मलोकमें गमन होना सम्भव नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उनके गमनका निषेध है। इस बातको दृढ़ करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित करके उसका उत्तर दिया जाता है— प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॥ ४ । २ । १२ ॥ चेत्=यदि कहो; प्रतिषेधात्=प्रतिषेध होनेके कारण ( उसका गमन नहीं होता ); इति न=तो यह ठीक नहीं; शारीरात्=क्योंकि उस प्रतिषेध- वचनके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंको अलग होनेका निषेध किया गया है। व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है कि 'जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम और केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ६ ) । इस श्रुतिमें कामनारहित महापुरुषकी गतिका अभाव बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि उसका ब्रह्मलोकमें गमन नहीं होता, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त श्रुतिमें जीवात्मासे प्राणोंके अलग होनेका निषेध है, न कि शरीरसे। अतः इससे गमनका निषेध सिद्ध नहीं होता, अपितु जीवात्मा प्राणोंके सहित ब्रह्मलोकमें जाता है, इसी बातकी पुष्टि होती है। सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सिद्धान्ती कहते हैं— स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ ४ । २ । १३ ॥ एकेषाम्=एक शाखावालोंकी श्रुतिमे; स्पष्टः=स्पष्ट ही शरीरसे प्राणोंके उत्क्रमण न होनेकी बात कही है; हि=इसलिये ( यही सिद्ध होता है कि उसका गमन नहीं होता )। व्याख्या—एक शाखाकी श्रुतिमें स्पष्ट ही यह बात कही गयी है कि 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति'—'उस आप्तकाम महापुरुषके प्राण उत्क्रमग नहीं करते, यहीं विलीन हो जाते हैं; वह ब्रह्म होकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है।' ( नृसिंहो० ५ ) इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषद्के अगले मन्त्रमें यह भी कहा है कि 'अत्र ब्रह्म समश्नुते'—'वह यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ७ )। दूसरी श्रुतिमें यह भी बताया गया है कि— विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ 'यह जीवात्मा समस्त प्राण, पाँचों भूत तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंके

सूत्र १२--१५ ] अध्याय ४ ३५५

सूत्र १२--१५ ] अध्याय ४ ३५५ सहित जिसमे प्रतिष्ठित है, उस परम अविनाशी परमात्माको जो जान लेता है, हे सोम्य ! वह सर्वज्ञ महापुरुष उस सर्वरूप परमात्मामे प्रविष्ट हो जाता है।' (प्र० उ० ४ । ११) । इन सब श्रुतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि उस महापुरुषका लोकान्तर- मे गमन नहीं होता । तथा जीवात्मासे प्राणोंके उत्क्रमणके निषेधकी यहाँ आवश्यकता भी नहीं है; इसलिये उस श्रुतिके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंके अलग होनेका निषेध मानना असङ्गत है । सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे उसी बातको दृढ करते है— स्मर्यते च ॥ ४ । २ । १४ ॥ च=तथा; स्मर्यते=स्मृतिसे भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—'जिसका मोह सर्वथा नष्ट हो गया है, ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ब्रह्ममे स्थित रहता हुआ न तो प्रियको पाकर हर्षित होता है और न अप्रियको पाकर उद्विग्न ही होता है।' * (गीता ५ । २०) । 'जिनके पाप सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, जो सब प्राणियोंके हितमे संलग्न है तथा जिनके समस्त संशय नष्ट हो चुके हैं; ऐसे विजितात्मा महापुरुष शान्त ब्रह्मको प्राप्त है।' † (गीता ५ । २५) । 'उनके सब ओर ब्रह्म ही वर्तता है।' ‡ (गीता ५ । २६) । इस प्रकार स्मृतिमें जगह-जगह उन महापुरुषोका जीवनकालमे ही ब्रह्मको प्राप्त होना कहा गया है तथा जहाँ गमनका प्रकरण आया है, वहाँ शरीरसे समस्त सूक्ष्म तत्त्वोंको साथ लेकर ही गमन करनेकी बात कही है (१५ । ७) । इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि जिन महापुरुषोको जीवनकालमे ही परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उनका किसी भी परलोकमे गमन नहीं होता है। सम्बन्ध—जो महात्मा जीवनकालमें परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं, वे यदि परलोकमें नहीं जाते तो शरीरनाशके समय कहाँ रहते हैं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तानि परे तथा ह्याह ॥ ४ । २ । १५ ॥

  • न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ † लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ ‡ अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥

३५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ तानि=वे प्राण, अन्तःकरण, पाँच सूक्ष्मभूत तथा इन्द्रियाँ सब-के- सब; परे=उस परब्रह्ममें ( विलीन हो जाते हैं ); हि=क्योंकि; तथा=ऐसा ही; आह=श्रुति कहती है । व्याख्या—जो महापुरुष जीवनकालमें ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है, वह एक प्रकारसे निरन्तर उस परब्रह्म परमात्मामे ही स्थित रहता है; उससे कभी अलग नहीं होता तो भी लोकदृष्टिसे शरीरमें रहता है, अतः जब प्रारब्ध पूरा होने- पर शरीरका नाश हो जाता है, उस समय वह शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रिय आदि सब कलाओंके सहित उस परमात्मामे ही विलीन हो जाता है। श्रुतिमें भी यही कहा है—'उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ और मनसहित समस्त इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी देवताओ- में स्थित हो जाते हैं, उनके साथ जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसके बाद विज्ञानमय जीवात्मा, उसके समस्त कर्म और उपर्युक्त सब देवता—ये सब- के-सब परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं।' ( मु० उ० ३ । २ । ७ )। सम्बन्ध—शरीरसम्बन्धी सब तत्त्वोंके सहित वह महापुरुष उस परमात्मामें किस प्रकार स्थित होता है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— अविभागो वचनात् ॥ ४ । २ । १६ ॥ वचनात्=श्रुतिके कथनसे ( यह मालूम होता है कि ); अविभागः= विभाग नहीं रहता। व्याख्या—मरणकालमे साधारण मनुष्योका जीवात्माके सहित उस परमदेवमे स्थित होना कहा गया है तथा अपने-अपने कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोमे कर्मफलका उपभोग करनेके लिये वहाँसे उनका जाना भी बताया गया है ( क० उ० २ । ५ । ७ )। इसलिये प्रलयकी भाँति परमात्मामे स्थित होकर भी वे उनसे विभक्त ही रहते हैं; किंतु यह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष तो सब तत्त्वोंके सहित यहीं परमात्मामें लीन होता है; अतः विभागरहित होकर अपने परम कारणभूत ब्रह्ममे मिल जाता है । श्रुति भी ऐसा ही वर्णन करती है—'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती है, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ८ )

  • यह मन्त्र पृष्ठ ४७ मे अर्थसहित आ गया है । -

सूत्र १६-१७ ] अध्याय ४ ३५७

सूत्र १६-१७ ] अध्याय ४ ३५७ सम्बन्ध-ब्रह्मलोकमे जानेवालोंकी गतिका प्रकार बतानेके उद्देश्यसे प्रकरण आरम्भ करके सातवें सूत्रमे यह सिद्ध किया गया कि मृत्युकालमे प्राण, मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्मा स्थूल शरीरसे निकलते समय सूक्ष्म पाँच भूतोंके समुदायरूप सूक्ष्म शरीरमें स्थित होता है। यहाँतक तो साधारण मनुष्यके समान ही विद्वान्की भी गति हे। उसके बाद आठवें सूत्रमे यह निर्णय किया गया कि साधारण मनुष्य तो सबके कारणरूप परमेश्वरमें प्रलयकालकी भाँति स्थित होकर परमात्माके-विधानानुसार कर्मफलभोगके लिये दूसरे शरीरमें चले जाते हैं, किन्तु ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मलोकमे जाता है। फिर प्रसङ्गवश नवेंसे ग्यारहवें सूत्रतक सूक्ष्म शरीरकी सिद्धि की गयी और बारहवेंसे सोलहवेंतक, जिन महापुरुषोंको जीवनकालमे ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है, वे ब्रह्मलोकमें न जाकर यहीं ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं यह निर्णय किया गया; अब इस सत्रहवें सूत्रसे पुनः ब्रह्मलोकमें जानेवाले विद्वान्की गतिके विषयमे विचार आरम्भ करते हैं। सूक्ष्म शरीरमे स्थित होनेके अनन्तर वह विद्वान् किस प्रकार ब्रह्म- लोकमें जाता है, यह बतानेके लिये अगला प्रकरण प्रस्तुत किया जाता है - तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्यनु- स्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॥ ४ । २ । १७॥ ( स्थूल शरीरसे निकलते समय ) तदोकोऽग्रज्वलनम् = उस जीवात्माका निवासस्थान जो हृदय है, उसके अग्रभागमे प्रकाश हो जाता है; तत्प्रकाशित- द्वारः=उस प्रकाशमे जिसके निकलनेका द्वार प्रकाशित हो गया है, ऐसा वह विद्वान्; विद्यासामर्थ्यात्=ब्रह्मविद्याके प्रभावसे; च=तथा; तच्छेषगत्यनुस्मृति- योगात् = उस विद्याका शेष अङ्ग जो ब्रह्मलोकमे गमन है, उस गमनविषयक संस्कारकी स्मृतिके योगसे; हार्दानुगृहीतः = हृदयस्थ परमेश्वरकी कृपासे अनुगृहीत हुआ; शताधिकया=एक-सौ नाडियोसे अधिक जो एक ( सुषुम्ना ) नाडी है, उसके द्वारा ( ब्रह्मरन्ध्रसे निकलता है ) । व्याख्या-श्रुतिमे मरणासन्न मनुष्यके समस्त इन्द्रिय, प्राण तथा अन्त करणके लिङ्गशरीरमें एक हो जानेकी बात कहकर हृदयके अग्रभागमे प्रकाश होनेका कथन आया है* ( बृह० उ० ४ । ४ । २ ) तथा साधारण मनुष्य और ॐ 'तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति ।' 'इसके उस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा निकलता है।'

३५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ब्रह्मवेत्ताके निकलनेका रास्ता इस प्रकार भिन्न-भिन्न बताया है कि 'हृदयसे सम्बद्ध एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेसे एक मस्तककी ओर निकली है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला विद्वान् अमृतत्वको प्राप्त होता है, शरीरसे जाते समय अन्य नाडियाँ इधर-उधरके मार्गसे नाना योनियोमे ले जानेवाली होती हैं* (छा० उ० ८। ६। ६)। इन श्रुतिप्रमाणोंसे यही निश्चय होता है कि मरण- कालमे वह महापुरुष हृदयके अग्रभागमें होनेवाले प्रकाशसे प्रकाशित ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे इस स्थूल शरीरके बाहर निकलता है और ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसके फलरूप ब्रह्मलोककी प्राप्तिके संस्कारकी स्मृतिसे युक्त हो हृदयस्थित सर्वसुहृद् परब्रह्म परमेश्वरसे अनुगृहीत हुआ सूर्यकी रश्मियोमे चला जाता है। सम्बन्ध-उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- रश्म्यनुसारी ॥ ४ । २ । १८ ॥ रश्म्यनुसारी = सूर्यकी रश्मियोमे स्थित हो उन्हींका अवलम्बन करके (वह सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है)। व्याख्या-'इस स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर वह जीवात्मा इन सूर्यकी रश्मियोंद्वारा ऊपर चढ़ता है, वहाँ 'ॐ' ऐसा कहता हुआ जितनी देरमे मन जाता है, उतने ही समयमें सूर्यलोकमें पहुँच जाता है, यह सूर्य ही विद्वानोके लिये ब्रह्मलोकमे जानेका द्वार है, यह अविद्वानोके लिये बंद रहता है, इसलिये वे नीचेके लोकोंमे जाते हैं।'† (छा० उ० ८। ६। ५)। इस श्रुतिके कथनसे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मरन्ध्रके मार्गद्वारा स्थूल शरीरसे बाहर निकलकर ब्रह्मवेत्ता सूर्यकी रश्मियोंमें स्थित होकर उन्हींका आश्रय ले सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमे चला जाता है; उसमे उसको विलम्ब नहीं होता। सम्बन्ध-रात्रिके समय तो सूर्यकी रश्मियाँ नहीं रहतीं, अतः यदि किसी ज्ञानीका देहपात रात्रिके समय हो तो उसका क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वा- दर्शयति च ॥ ४ । २ । १९ ॥

  • यह मन्त्र सूत्र ४। २ । ९ की व्याख्यामे अर्थसहित आ गया है। † 'अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद् वा मीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद् वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्।'

सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३५९

सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३५९ चेत्=यदि कहो कि; निशि=रात्रिमे; न=सूर्यकी रश्मियोंसे नाडीद्वारा उसका सम्बन्ध नहीं होता; इति न=नो यह कहना ठीक नहीं; ( हि )=क्योंकि; सम्बन्धस्य= नाडी और सूर्य-रश्मियोंके सम्बन्धकी; यावद्देहभावित्वात्=जबतक शरीर रहता है, तबतक सत्ता बनी रहती है, इसलिये ( दिन हो या रात, कभी भी नाडी और सूर्य- रश्मियोंका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता ); दर्शयति च=यही बात श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या—यदि कोई ऐसा कहे कि रात्रिमे देहपात होनेपर नाडियोंसे सूर्य- किरणोंका सम्बन्ध नहीं होगा, इसलिये उस समय मृत्युको प्राप्त हुआ विद्वान् सूर्यलोक-मार्गसे गमन नहीं कर सकता, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुतिमे कहा है कि—'इस सूर्यकी ये रश्मियाँ इस लोकमे और उस सूर्यलोकमे—दोनो जगह गमन करती हैं, वे सूर्यमण्डलसे निकलती हुई शरीरकी नाडियोंमे व्याप्त हो रही हैं तथा नाडियोंसे निकलती हुई सूर्यमे फैली हुई है।' * (छा० उ० ८। ६। २)। इसलिये श्रुतिके इस कथना- नुसार जबतक शरीर रहता है, तबतक हर जगह और हर समय सूर्यकी रश्मियाँ उसकी नाडियोंमे व्याप्त रहती हैं; अतः किसी समय भी देहपात होनेपर सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्माका नाडियोंके द्वारा तत्काल सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध होता है और वह विद्वान् सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमे चला जाता है। सम्बन्ध—क्या दक्षिणायनकालमें मरनेपर भी विद्वान् ब्रह्मलोकमें चला जाता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४ । २ । २० ॥ अतः=इस पूर्वमे कहे हुए कारणसे; च=ही; दक्षिणे=दक्षिण; अयने= अयनमे; अपि=( मरनेवालेका ) भी ( ब्रह्मलोकमें गमन हो जाता है ) । व्याख्या—पूर्वसूत्रके कथनानुसार जिस प्रकार रात्रिके समय सूर्यकी रश्मियों- से सम्बन्ध हो जानेमे कोई बाधा नहीं होती, उसी प्रकार दक्षिणायनकालमे भी कोई बाधा न होनेसे वह विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे जा सकता है। इसलिये यही समझना चाहिये कि दक्षिणायनके समय शरीर छोड़कर जानेवाला महापुरुष भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे सूर्यलोकके द्वारसे तत्काल ब्रह्मलोकमे पहुँच जाता है।

  • एता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ।

३६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ भीष्म आदि महापुरुषोंके विषयमें जो उत्तरायणकालकी प्रतीक्षाका वर्णन आता है, उसका आशय यह हो सकता है कि भीष्मजी वसु देवता थे, उनको देव- लोकमे जाना था और दक्षिणायनके समय देवलोकमे रात्रि रहती है। इसलिये वे कुछ दिनोतक प्रतीक्षा करते रहे। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'हे अर्जुन ! जिस कालमे शरीर त्यागकर गये हुए योगीलोग पीछे न लौटनेवाली और पीछे लौटनेवाली गतिको प्राप्त होते हैं, वह काल मैं तुझे बतलाता हूँ' (गीता ८ । २३)—इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण आदि कालको तो अपुनरावृत्तिकारक बताया गया है तथा रात्रि और दक्षिणायन आदिको पुनरा- वृत्तिका काल नियत किया गया है; फिर यहाँ कैसे कहा गया कि रात्रि और दक्षिणायनमें भी देहत्याग करनेवाला विद्वान् ब्रह्मलोकमें जा सकता है ? इसपर कहते हैं— योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ ४ । २ । २१ ॥ च=इसके सिवा; योगिनः=योगीके; प्रति=लिये (यह कालविशेषका नियम); स्मर्यते=स्मृतिमे कहा जाता है; च=तथा; एते=यहाँ कहे हुए ये, अपुनरावृत्ति और पुनरावृत्तिरूप दोनों मार्ग; स्मार्ते=स्मार्त हैं। व्याख्या—गीतामे जिन दो गतियोंका वर्णन है, वे स्मार्त अर्थात् श्रुतिवर्णित मार्गसे भिन्न है। इसके सिवा वे योगीके लिये कहे गये है। इस प्रकार विषयका भेद होनेके कारण वहाँ आवृत्ति और अनावृत्तिके लिये नियत किये हुए काल- विशेषसे इस श्रुतिनिरूपित गतिमें कोई विरोध नहीं आता। जो लोग गीताके श्लोकोमे काल शब्दके प्रयोगसे दिन, रात, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन—इन शब्दोको कालवाचक मानकर उनसे कालविशेषको ही ग्रहण करते हैं, उन्हींके लिये यह समाधान किया गया है; किन्तु यदि उन शब्दोका अर्थ लोकान्तरमे पहुँचानेवाले उन-उन कालोके अभिमानी देवता मान लिया जाय तो श्रुतिके वर्णनसे कोई विरोध नहीं है। दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

तीसरा पाद दूसरे पादमें यह बताया गया कि ब्रह्मलोकमें जानेके मार्गका आरम्भ होनेसे पूर्वतककी गति ( वाणीका मनमें लय होना आदि ) विद्वान् और अविद्वान् दोनोंके लिये एक समान है; फिर अविद्वान् कर्मानुसार संसारमें पुनः नूतन शरीर ग्रहण करता है और ज्ञानी महापुरुष ज्ञानसे प्रकाशित मोक्षनाडीद्वारका आश्रय ले सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यलोकमें पहुँचकर वहाँसे ब्रह्मलोकमें चला जाता है। रात्रि और दक्षिणायन-कालमें भी विद्वान्‌की इस ऊर्ध्वगतिमें कोई बाधा नहीं आती; किन्तु ब्रह्मलोकमें जानेका जो मार्ग है, उसका वर्णन कहीं ' अर्चिर्मार्ग, कहीं उत्तरायणमार्ग और कहीं देवयानमार्गके नामसे किया गया है तथा इन मार्गोंके चिह्न भी भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उपासना और अधिकारीके भेदसे ये मार्ग भिन्न-भिन्न हैं या एक ही मार्गके ये सभी नाम हैं? इसके सिवा, मार्गमें कहीं तो नाना देवताओंके लोकोंका वर्णन आता है, कहीं दिन, पक्ष, मास, अयन और संवत्सरका वर्णन आता है और कहीं केवल सूर्यरश्मियों तथा सूर्यलोकका ही वर्णन आता है; यह वर्णनका भेद एक मार्ग माननेसे किस प्रकार संगत होगा? अतः इस विषयका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद तथा अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४ । ३ । १ ॥ अर्चिरादिना = अर्चिसे आरम्भ होनेवाले एक ही मार्गसे ( ब्रह्मलोकको जाते हैं ); तत्प्रथितेः = क्योंकि ब्रह्मज्ञानियोंके लिये यह एक ही मार्ग ( विभिन्न नामोंसे ) प्रसिद्ध है। व्याख्या—श्रुतियोंमें ब्रह्मलोकमें जानेके लिये विभिन्न नामोंसे जिसका वर्णन किया गया है, वह एक ही मार्ग है, अनेक मार्ग नहीं हैं। उस मार्गका प्रसिद्ध नाम अर्चिः आदि है, क्योंकि वह अर्चिसे प्रारम्भ होनेवाला मार्ग है। इसीसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले सब साधक जाते हैं। इसीका देवयान, उत्तरायणमार्ग आदि नामोंसे वर्णन आया है। तथा मार्गमें आनेवाले लोकोंका जो वर्णन आता है, वह कहीं कम है, कहीं अधिक है। उन स्थलोंमें जहाँ जिस लोकका वर्णन

३६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नहीं किया गया है, वहाँ उसका अन्यत्रके वर्णनसे अध्याहार कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—एक जगह कहे हुए लोकोंका दूसरी जगह किस प्रकार अध्याहार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ ४ । ३ । २ ॥ वायुम्=वायुलोकको; अब्दात्=संवत्सरके बाद (और सूर्यके पहले समझना चाहिये); अविशेषविशेषाभ्याम्=क्योंकि कहीं वायुका वर्णन समानभावसे है और कहीं विशेषभावसे है। व्याख्या—एक श्रुति कहती है ‘जो इस प्रकार ब्रह्मविद्याके रहस्यको जानते है तथा जो वनमे रहकर श्रद्धापूर्वक सत्यकी उपासना करते हैं, वे अर्चि (ज्योति, अग्नि अथवा सूर्यकिरण) को प्राप्त होते हैं, अर्चिसे दिनकों, दिनसे शुक्लपक्षको, शुक्लपक्षसे उत्तरायणके छः महीनोको, छः महीनोसे संवत्सरको, संवत्सरसे सूर्यको, सूर्यसे चन्द्रमाको तथा चन्द्रमासे विद्युत्को। वहाँसे अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, यह देवयानमार्ग है।' (छा० उ० ५ । १० । १-२)। दूसरी श्रुतिका कथन है—‘जब यह मनुष्य इस लोकसे ब्रह्मलोकको जाता है, तब वह वायुको प्राप्त होता है, वायु उसके लिये रथ-चक्रके छिद्रकी भाँति रास्ता देता है। उस रास्तेसे वह ऊपर चढ़ता है, फिर वह सूर्यको प्राप्त होता है, वहाँ उसे सूर्य लम्बर नामके वाद्यमें रहनेवाले छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह चन्द्रमाको प्राप्त होता है, चन्द्रमा उसके लिये नगारेके छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह शोकरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है, वहाँ अनन्तकालतक निवास करता है (उसके बाद ब्रह्ममे लीन हो जाता है)।' (बृह०उ० ५ । १० । १)। तीसरी श्रुति कहती है—‘वह इस देवयानमार्गको प्राप्त होकर अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक तथा प्रजापतिलोकमे होता हुआ ब्रह्मलोकमे पहुँच जाता है।' (कौ० उ० १ । ३) इन वर्णनोंमें वायुलोकका वर्णन दो श्रुतियोमे आया है। कौषीतकि- उपनिषद्मे तो केवल लोकोंका नाममात्र कह दिया, विशेषरूपसे क्रमका स्पष्टीकरण नहीं किया; किन्तु बृहदारण्यकमें वायुलोकसे सूर्यलोकमे जानेका

सूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३

सूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३ उल्लेख स्पष्ट है । अतः छान्दोग्योपनिषद्‌की अर्चिसे आरम्भ करके मार्गका वर्णन करनेवाली श्रुतिमें अग्निके स्थानमें तो अर्चि कही है, परन्तु वहाँ वायुलोकका वर्णन नहीं है, इसलिये वायुलोकको संवत्सरके बाद और सूर्यके पहले मानना चाहिये । सम्बन्ध—वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकका भी अर्चि आदि मार्गमें वर्णन नहीं है, अतः उनको किसके बाद समझना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ॥ ४ । ३ । ३ ॥ तडितः=विद्युत्में; अधि=ऊपर; वरुणः=वरुणलोक ( समझना चाहिये ), सम्बन्धात्=क्योंकि उन दोनोंका परस्पर सम्बन्ध है । व्याख्या—वरुण जलका स्वामी है, विद्युत्का जलसे निकटतम सम्बन्ध है, इसलिये विद्युत्के ऊपर वरुणलोककी स्थिति समझनी चाहिये । उसके बाद इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंकी स्थिति भी उस श्रुतिमें कहे हुए क्रमानुसार समझ लेनी चाहिये । इस प्रकार सब श्रुतियोंकी एकता हो जायगी और एक मार्ग माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं रहेगा । सम्बन्ध—अर्चिरादि मार्गमें जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर, वायु और विद्युत् आदि बताये गये हैं, वे जड हैं या चेतन ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ॥ ४ । ३ । ४ ॥ आतिवाहिकाः=वे सब साधकको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देनेवाले उन-उन लोकोंके अभिमानी पुरुष हैं, क्योंकि श्रुतिमें; तल्लिङ्गात्=वैसा ही लक्षण देखा जाता है । व्याख्या—अर्चि, अहः आदि शब्दोंद्वारा कहे जानेवाले ये सब उन-उन नाम और लोकोंके अभिमानी देवता या मानवाकृति पुरुष हैं । इनका काम ब्रह्मलोकमें जानेवाले जीवको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देना है, इसीलिये इनको आतिवाहिक कहते हैं । विद्युल्लोकमें पहुँचनेपर अमानव पुरुष उस ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति कराता है । उसके लिये जो अमानव विशेषण दिया गया है, उससे सिद्ध होता है कि उसके पहले जो अर्चि आदि लोक प्राप्त होते हैं, वे उन-उन लोकोंके