ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नहीं किया गया है, वहाँ उसका अन्यत्रके वर्णनसे अध्याहार कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—एक जगह कहे हुए लोकोंका दूसरी जगह किस प्रकार अध्याहार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ ४ । ३ । २ ॥ वायुम्=वायुलोकको; अब्दात्=संवत्सरके बाद (और सूर्यके पहले समझना चाहिये); अविशेषविशेषाभ्याम्=क्योंकि कहीं वायुका वर्णन समानभावसे है और कहीं विशेषभावसे है। व्याख्या—एक श्रुति कहती है ‘जो इस प्रकार ब्रह्मविद्याके रहस्यको जानते है तथा जो वनमे रहकर श्रद्धापूर्वक सत्यकी उपासना करते हैं, वे अर्चि (ज्योति, अग्नि अथवा सूर्यकिरण) को प्राप्त होते हैं, अर्चिसे दिनकों, दिनसे शुक्लपक्षको, शुक्लपक्षसे उत्तरायणके छः महीनोको, छः महीनोसे संवत्सरको, संवत्सरसे सूर्यको, सूर्यसे चन्द्रमाको तथा चन्द्रमासे विद्युत्को। वहाँसे अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, यह देवयानमार्ग है।' (छा० उ० ५ । १० । १-२)। दूसरी श्रुतिका कथन है—‘जब यह मनुष्य इस लोकसे ब्रह्मलोकको जाता है, तब वह वायुको प्राप्त होता है, वायु उसके लिये रथ-चक्रके छिद्रकी भाँति रास्ता देता है। उस रास्तेसे वह ऊपर चढ़ता है, फिर वह सूर्यको प्राप्त होता है, वहाँ उसे सूर्य लम्बर नामके वाद्यमें रहनेवाले छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह चन्द्रमाको प्राप्त होता है, चन्द्रमा उसके लिये नगारेके छिद्रके सदृश रास्ता दे देता है। उस रास्तेसे ऊपर उठकर वह शोकरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है, वहाँ अनन्तकालतक निवास करता है (उसके बाद ब्रह्ममे लीन हो जाता है)।' (बृह०उ० ५ । १० । १)। तीसरी श्रुति कहती है—‘वह इस देवयानमार्गको प्राप्त होकर अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक तथा प्रजापतिलोकमे होता हुआ ब्रह्मलोकमे पहुँच जाता है।' (कौ० उ० १ । ३) इन वर्णनोंमें वायुलोकका वर्णन दो श्रुतियोमे आया है। कौषीतकि- उपनिषद्मे तो केवल लोकोंका नाममात्र कह दिया, विशेषरूपसे क्रमका स्पष्टीकरण नहीं किया; किन्तु बृहदारण्यकमें वायुलोकसे सूर्यलोकमे जानेका