ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २—४ ] अध्याय ४ ३६३ उल्लेख स्पष्ट है । अतः छान्दोग्योपनिषद्की अर्चिसे आरम्भ करके मार्गका वर्णन करनेवाली श्रुतिमें अग्निके स्थानमें तो अर्चि कही है, परन्तु वहाँ वायुलोकका वर्णन नहीं है, इसलिये वायुलोकको संवत्सरके बाद और सूर्यके पहले मानना चाहिये । सम्बन्ध—वरुण, इन्द्र और प्रजापति लोकका भी अर्चि आदि मार्गमें वर्णन नहीं है, अतः उनको किसके बाद समझना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ॥ ४ । ३ । ३ ॥ तडितः=विद्युत्में; अधि=ऊपर; वरुणः=वरुणलोक ( समझना चाहिये ), सम्बन्धात्=क्योंकि उन दोनोंका परस्पर सम्बन्ध है । व्याख्या—वरुण जलका स्वामी है, विद्युत्का जलसे निकटतम सम्बन्ध है, इसलिये विद्युत्के ऊपर वरुणलोककी स्थिति समझनी चाहिये । उसके बाद इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंकी स्थिति भी उस श्रुतिमें कहे हुए क्रमानुसार समझ लेनी चाहिये । इस प्रकार सब श्रुतियोंकी एकता हो जायगी और एक मार्ग माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं रहेगा । सम्बन्ध—अर्चिरादि मार्गमें जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर, वायु और विद्युत् आदि बताये गये हैं, वे जड हैं या चेतन ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ॥ ४ । ३ । ४ ॥ आतिवाहिकाः=वे सब साधकको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देनेवाले उन-उन लोकोंके अभिमानी पुरुष हैं, क्योंकि श्रुतिमें; तल्लिङ्गात्=वैसा ही लक्षण देखा जाता है । व्याख्या—अर्चि, अहः आदि शब्दोंद्वारा कहे जानेवाले ये सब उन-उन नाम और लोकोंके अभिमानी देवता या मानवाकृति पुरुष हैं । इनका काम ब्रह्मलोकमें जानेवाले जीवको एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुँचा देना है, इसीलिये इनको आतिवाहिक कहते हैं । विद्युल्लोकमें पहुँचनेपर अमानव पुरुष उस ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति कराता है । उसके लिये जो अमानव विशेषण दिया गया है, उससे सिद्ध होता है कि उसके पहले जो अर्चि आदि लोक प्राप्त होते हैं, वे उन-उन लोकोंके