भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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३६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अभिमानी देवता या मानवाकार पुरुष हैं। है वे भी दिव्य ही, परन्तु उनकी आकृति मानवो-जैसी है। सम्बन्ध—इस प्रकार अभिमानी देवता माननेकी क्या आवश्यकता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ॥ ४ । ३ । ५ ॥ उभयव्यामोहात्=दोनोके मोहयुक्त होनेका प्रसङ्ग आ जाता है, इसलिये; तत्सिद्धेः=उनको अभिमानी देवता माननेसे ही उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक ले जानेका कार्य सिद्ध हो सकता है। अतः ( वैसा ही मानना चाहिये )। व्याख्या—यदि अर्चि आदि शब्दोसे उनके अभिमानी देवता न मानकर उन्हें ज्योति और लोकविशेषरूप जड पदार्थ मान ले तो दोनोंके ही मोहयुक्त ( मार्ग- ज्ञानशून्य ) होनेसे ब्रह्मलोकतक पहुँचना ही सम्भव न होगा; क्योकि गमन करनेवाला जीवात्मा तो वहाँके मार्गसे परिचित है नहीं, उसको आगे ले जानेवाले अर्चि आदि भी यदि चेतन न हो तो मार्गको जाननेवाला कोई न रहनेसे देवयान और पितृयानमार्गका ज्ञान होना असम्भव हो जायगा। इसलिये अर्चि आदि शब्दोसे उन-उनके अभिमानी देवताओका वर्णन मानना आवश्यक है। तभी उनके द्वारा ब्रह्मलोकतक पहुँचानेका कार्य सिद्ध हो सकेगा। अतः मार्गमे जिन-जिन लोकोंका वर्णन आया है, उनसे उन-उन लोकोके अधिष्ठाता देवताको ही समझना चाहिये, अपने लोकसे अगले लोकमे पहुँचा देना ही उनका काम है। सम्बन्ध—विद्युत्-लोकके अनन्तर यह कहा गया है कि वह अमानव पुरुष उनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है। ( छा० उ० ५ । १० । १ ) तब बीचमें आने- वाले वरुण, इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंके अभिमानी देवताओंका क्या काम रहेगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॥ ४ । ३ । ६ ॥ ततः=वहाँसे आगे ब्रह्मलोकतक; वैद्युतेन=विद्युत्-लोकमे प्रकट हुए अमानव पुरुषद्वारा; एव=ही ( पहुँचाये जाते है ); तच्छ्रुतेः=क्योंकि वैसा ही श्रुतिमें कहा है— व्याख्या—वहाँसे उनको वह विद्युत्-लोकमे प्रकट हुआ अमानव पुरुष ब्रह्मके