ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३५९ चेत्=यदि कहो कि; निशि=रात्रिमे; न=सूर्यकी रश्मियोंसे नाडीद्वारा उसका सम्बन्ध नहीं होता; इति न=नो यह कहना ठीक नहीं; ( हि )=क्योंकि; सम्बन्धस्य= नाडी और सूर्य-रश्मियोंके सम्बन्धकी; यावद्देहभावित्वात्=जबतक शरीर रहता है, तबतक सत्ता बनी रहती है, इसलिये ( दिन हो या रात, कभी भी नाडी और सूर्य- रश्मियोंका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता ); दर्शयति च=यही बात श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या—यदि कोई ऐसा कहे कि रात्रिमे देहपात होनेपर नाडियोंसे सूर्य- किरणोंका सम्बन्ध नहीं होगा, इसलिये उस समय मृत्युको प्राप्त हुआ विद्वान् सूर्यलोक-मार्गसे गमन नहीं कर सकता, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुतिमे कहा है कि—'इस सूर्यकी ये रश्मियाँ इस लोकमे और उस सूर्यलोकमे—दोनो जगह गमन करती हैं, वे सूर्यमण्डलसे निकलती हुई शरीरकी नाडियोंमे व्याप्त हो रही हैं तथा नाडियोंसे निकलती हुई सूर्यमे फैली हुई है।' * (छा० उ० ८। ६। २)। इसलिये श्रुतिके इस कथना- नुसार जबतक शरीर रहता है, तबतक हर जगह और हर समय सूर्यकी रश्मियाँ उसकी नाडियोंमे व्याप्त रहती हैं; अतः किसी समय भी देहपात होनेपर सूक्ष्म शरीरसहित जीवात्माका नाडियोंके द्वारा तत्काल सूर्यकी रश्मियोंसे सम्बन्ध होता है और वह विद्वान् सूर्यलोकके द्वारसे ब्रह्मलोकमे चला जाता है। सम्बन्ध—क्या दक्षिणायनकालमें मरनेपर भी विद्वान् ब्रह्मलोकमें चला जाता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४ । २ । २० ॥ अतः=इस पूर्वमे कहे हुए कारणसे; च=ही; दक्षिणे=दक्षिण; अयने= अयनमे; अपि=( मरनेवालेका ) भी ( ब्रह्मलोकमें गमन हो जाता है ) । व्याख्या—पूर्वसूत्रके कथनानुसार जिस प्रकार रात्रिके समय सूर्यकी रश्मियों- से सम्बन्ध हो जानेमे कोई बाधा नहीं होती, उसी प्रकार दक्षिणायनकालमे भी कोई बाधा न होनेसे वह विद्वान् सूर्यलोकके मार्गसे जा सकता है। इसलिये यही समझना चाहिये कि दक्षिणायनके समय शरीर छोड़कर जानेवाला महापुरुष भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे सूर्यलोकके द्वारसे तत्काल ब्रह्मलोकमे पहुँच जाता है।
- एता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ।