ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ भीष्म आदि महापुरुषोंके विषयमें जो उत्तरायणकालकी प्रतीक्षाका वर्णन आता है, उसका आशय यह हो सकता है कि भीष्मजी वसु देवता थे, उनको देव- लोकमे जाना था और दक्षिणायनके समय देवलोकमे रात्रि रहती है। इसलिये वे कुछ दिनोतक प्रतीक्षा करते रहे। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'हे अर्जुन ! जिस कालमे शरीर त्यागकर गये हुए योगीलोग पीछे न लौटनेवाली और पीछे लौटनेवाली गतिको प्राप्त होते हैं, वह काल मैं तुझे बतलाता हूँ' (गीता ८ । २३)—इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण आदि कालको तो अपुनरावृत्तिकारक बताया गया है तथा रात्रि और दक्षिणायन आदिको पुनरा- वृत्तिका काल नियत किया गया है; फिर यहाँ कैसे कहा गया कि रात्रि और दक्षिणायनमें भी देहत्याग करनेवाला विद्वान् ब्रह्मलोकमें जा सकता है ? इसपर कहते हैं— योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते ॥ ४ । २ । २१ ॥ च=इसके सिवा; योगिनः=योगीके; प्रति=लिये (यह कालविशेषका नियम); स्मर्यते=स्मृतिमे कहा जाता है; च=तथा; एते=यहाँ कहे हुए ये, अपुनरावृत्ति और पुनरावृत्तिरूप दोनों मार्ग; स्मार्ते=स्मार्त हैं। व्याख्या—गीतामे जिन दो गतियोंका वर्णन है, वे स्मार्त अर्थात् श्रुतिवर्णित मार्गसे भिन्न है। इसके सिवा वे योगीके लिये कहे गये है। इस प्रकार विषयका भेद होनेके कारण वहाँ आवृत्ति और अनावृत्तिके लिये नियत किये हुए काल- विशेषसे इस श्रुतिनिरूपित गतिमें कोई विरोध नहीं आता। जो लोग गीताके श्लोकोमे काल शब्दके प्रयोगसे दिन, रात, शुक्लपक्ष, कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन—इन शब्दोको कालवाचक मानकर उनसे कालविशेषको ही ग्रहण करते हैं, उन्हींके लिये यह समाधान किया गया है; किन्तु यदि उन शब्दोका अर्थ लोकान्तरमे पहुँचानेवाले उन-उन कालोके अभिमानी देवता मान लिया जाय तो श्रुतिके वर्णनसे कोई विरोध नहीं है। दूसरा पाद सम्पूर्ण ।