भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

सूत्र ९—१२ ] अध्याय ४ ३६७ जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक ब्रह्मलोकोंमें जाकर अन्तकाल- मे परम अमृतस्वरूप होकर भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ६ ) इस प्रकार श्रुतिमे उन सबकी मुक्तिका कथन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रलयकालमे ब्रह्मलोकका नाश होनेपर उसके स्वामी ब्रह्माके सहित वहाँ गये हुए ब्रह्मविद्याके उपासक भी परब्रह्मको प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं, इसलिये उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती । सम्बन्ध—स्मृति-प्रमाणसे पूर्वपक्षको पुष्ट करते हैं— स्मृतेश्च ॥ ४ । ३ । ११ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है) । व्याख्या—वे सब शुद्ध अन्त.करणवाले पुरुष प्रलयकाल प्राप्त होनेपर समस्त जगत्के अन्तमे ब्रह्माके साथ उस परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं ।'† ( कू० पु० पूर्वख० १२ । २६९ ) इस प्रकार स्मृतिमे भी यही भाव प्रदर्शित किया है, इसलिये कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यही मानना ठीक है । सम्बन्ध—यहाँतक पूर्वपक्षकी स्थापना करके उसके उत्तरमें आचार्य जैमिनि- का मत उद्धृत करते हैं— परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ॥ ४ । ३ । १२ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनिका कहना है कि; मुख्यत्वात्=ब्रह्मशब्दका मुख्य वाच्यार्थ होनेके कारण; परम्=परब्रह्मको प्राप्त होता है ( यही मानना युक्तिसङ्गत है ) । व्याख्या—वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है ( छा० उ० ४ । १५ । ५ ) श्रुतिके इस वाक्यमे कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्यतया परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, इसलिये अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते है, कार्यब्रह्मको नहीं। जहाँ मुख्य अर्थकी उपयोगिता नहीं हो, वहीं गौण अर्थकी कल्पना की जा सकती है, मुख्य अर्थकी उपयोगिता रहते हुए नहीं । वह परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण होनेपर भी उसके परम

  • यह मन्त्र पृष्ठ २९३ मे अर्थसहित आ गया है । † ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे । परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥