ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ धामका प्रतिपादन और वहाँ विद्वान् उपासकोके जानेका वर्णन श्रुति (क० उ० १ । ३।९), (प्र० उ० १।१०) और स्मृतियोमे (गीता १५। ६) जगह-जगह किया गया है। इसलिये उसके लोकविशेषमे गमन करनेके लिये कहना कार्यब्रह्मका द्योतक नहीं है। बहुवचनका प्रयोग भी आदरके लिये किया जाना सम्भव है तथा उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके अपने लिये रचे हुए अनेक लोकोका होना भी कोई असम्भव बात नहीं है। अतः सर्वथा यही सिद्ध होता है कि वे उसीके परम- धाममे जाते है तथा परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्मको नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते है— दर्शनाच्च ॥ ४ । ३ । १३ ॥ दर्शनात्=श्रुतिमें जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति दिखायी गयी है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं है)। व्याख्या—'उनमेंसे सुषुम्ना नाडीद्वारा ऊपर उठकर अमृतत्वको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८। ६। ६) 'वह संसारमार्गके उस पार उस विष्णुके परम- पदको प्राप्त होता है।' (क० उ० १ । ३ । ९) इसके सिवा सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलकर जानेका वर्णन कठोपनिषद्मे भी वैसा ही आया है (क० उ० २ । ३ । १६) इस प्रकार जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति श्रुतिमे प्रदर्शित की गयी है। इससे यही सिद्ध होता है कि देवयान-मार्गके द्वारा जानेवाले ब्रह्मविद्याके उपासक परब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं, न कि कार्यब्रह्मको। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ ४ । ३ । १४ ॥ च=इसके सिवा; प्रतिपत्त्यभिसन्धिः=उन ब्रह्मविद्याके उपासकोका प्राप्ति- विषयक संकल्प भी; कार्ये=कार्यब्रह्मके लिये; न=नहीं है। व्याख्या—इसके सिवा, उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका जो प्राप्तिविषयक संकल्प है, वह कार्यब्रह्मके लिये नहीं है; अपितु परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये उनकी साधनमे प्रवृत्ति देखी गयी है; इसलिये भी उनको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती, परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। श्रुतिमे जो यह कहा गया है कि वे