ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ बात बतायी गयी है ( छा० उ० ८ । ३ । ४) और उसका नाम 'सत्य अर्थात् सत्यलोक कहा है। उसके पूर्व जो यह कहा है कि 'जो यहाँ इस आत्माको तथा इन सत्यकामोको जानकर परलोकमे जाते हैं, उनका सब लोकोमे इच्छानुसार गमन होता है' (छा० उ० ८ । १ । ६) यह वर्णन आत्म-ज्ञान- की महिमा दिखानेके लिये है। किन्तु दूसरे खण्डका वर्णन तो स्पष्ट ही जीवनकालका है। उक्त प्रकरण दहर-विद्याका है और ( दहर ) यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका वाचक है, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है, (ब्र० सू० १ । ३ । १४) इसलिये यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रकरण हिरण्यगर्भकी या जीवात्माके अपने स्वरूपकी उपासनाका है। सम्बन्ध-उस परमधाममें जो वह उपासक अपने वास्तविक रूपसे सम्पन्न होता है, उसमें पहलेकी अपेक्षा क्या विशेषता होती है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ ४ । ४ । २ ॥ प्रतिज्ञानात्=प्रतिज्ञा की जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि; मुक्तः= (वह स्वरूप) सब प्रकारके बन्धनोसे मुक्त (होता) है। व्याख्या-श्रुतिमें जगह-जगह यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'उस परब्रह्म परमात्माके लोकको प्राप्त होनेके बाद यह साधक सदाके लिये सब प्रकारके बन्धनोंसे छूट जाता है।' (मु० उ० ३ । २ । ६) इसीसे यह सिद्ध होता है कि अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होनेपर उपासक सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित, सर्वथा शुद्ध, दिव्य, विभु और विज्ञानमय होता है, उसमे किसी प्रकारका विकार नहीं रहता। पूर्वकालमे अनादिसिद्ध कर्मसंस्कारोके कारण जो इसका स्वरूप कर्मानुसार प्राप्त शरीरके अनुरूप हो रहा था; (ब्र० सू० २ । ३ । ३०) परमधाममे जानेके बाद वैसा नहीं रहता। यह सब बन्धनोसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध-यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय उपासक सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ? इसपर कहते हैं— आत्मा प्रकरणात् ॥ ४ । ४ । ३ ॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध आत्मा ही हो जाता है।