ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र .२-५ ] अध्याय ४ ३७३ व्याख्या—उस प्रकरणमे जो वर्णन है, उसमे यह स्पष्ट कहा गया है कि 'वह ब्रह्मलोकमे प्राप्त होनेवाला स्वरूप आत्मा है' ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) । अतः उस प्रकरणसे ही यह सिद्ध होता है कि उस समय वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्माके समान परम दिव्य शुद्ध स्वरूपसे युक्त हो जाता है। ( गीता १४ । २; तथा मु० उ० ३ । १ । ३ )। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जाकर उस उपासककी परमात्मासे पृथक् स्थिति रहती है या वह उन्हींमे मिल जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। पहले क्रमशः तीन प्रकारके मत प्रस्तुत करते हैं— अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ ४ । ४ । ४ ॥ अविभागेन = ( उस मुक्तात्माकी स्थिति उस परब्रह्ममे ) अविभक्त रूपसे होती है; दृष्टत्वात् = क्योकि यही बात श्रुतिमे देखी गयी है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि— 'यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥' 'हे गौतम ! जिस प्रकार शुद्ध जलमे गिरा हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है. उसी प्रकार परमात्माको जाननेवाले मुनिका आत्मा हो जाता है।' ( क० उ० २ । १ । १५ ) । 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नामरूपोको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती हैं, वैसे ही परमात्माको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर, दिव्य, परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ८ ) । श्रुतिके इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा उस परब्रह्म परमात्मामें अविभक्त रूपसे ही स्थित होता है। सम्बन्ध—इस विषयमें जैमिनिका मत बतलाते हैं— ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥ ४ । ४ । ५ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि; ब्राह्मेण = ब्रह्मके सदृश रूपसे स्थित होता है; उपन्यासादिभ्यः = क्योकि श्रुतिमे जो उसके स्वरूपका निरूपण किया गया है, उसे देखनेसे और श्रुति-प्रमाणमे भी यही सिद्ध होता है।
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