भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र २७-२९ ] अध्याय १ १९ स्वरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमें उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है। * ये सब बातें ब्रह्मके ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ 'प्राण'शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध—उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमें स्वयं अपनेको ही प्राण कहा है। इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर हैं ही; फिर वहाँ 'प्राण' शब्दको इन्द्रका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध- भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥ चेत्=यदि कहो; वक्तुः=वक्ता (इन्द्र) का (उद्देश्य); आत्मोपदेशात् = अपनेको ही 'प्राण' नामसे बतलाना है, इसलिये; न=प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति=( नो ) यह कथन: ( न )=ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; अस्मिन् = इस प्रकरणमें; अध्यात्मसम्बन्धभूमा=अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बहुलता है। व्याख्या—यदि कहो कि इस प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्टरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमें 'प्राण'शब्दको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है; तो ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है।† यहाँ आधिदैविक वर्णन नहीं है; अतः उपास्यरूपसे बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता। इसलिये यहाँ 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये।

  • कौषीतकि-उपनिषद्में यह प्रसङ्ग इस प्रकार है— स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति...।' (कौ० उ० ३। १) 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।' (कौ० उ० ३। २) 'एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽऽ- नन्दोऽजरोऽमृतः••••••एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः।' (कौ० उ० ३। ९) † इस प्रसङ्गमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें देखें।