ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि 'मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर।' इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं— शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥ उपदेशः=( यहाँ ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु=तो; वामदेववत्= वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्ट्या=( केवल ) शास्त्र-दृष्टिसे है । व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद् ( १ । ४ । १० ) मे यह वर्णन आया है कि 'तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैत- त्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति।' अर्थात् 'उस ब्रह्मको देवताओमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया । उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।' इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है । अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न-अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि 'मैं ही ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ । तू मुझ परमात्माकी उपासना कर।' अतः 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है । सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं-- जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित- त्वादिह तद्योगात् ॥ १ । १ । ३१ ॥ चेत्=यदि कहो; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात्=( इस प्रसङ्गके वर्णनमे ) जीवात्मा तथा प्रसिद्ध प्राणके लक्षण पाये जाते है, इसलिये; न=प्राण शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; उपासात्रैविध्यात्=क्योकि ऐसा माननेपर त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; आश्रितत्वात्=( इसके