ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३-६ ] अध्याय १ २५ शब्दविशेषात् ॥ १ । २ । ५ ॥ शब्दविशेषात् = ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है ) । व्याख्या—छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि 'यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है ।' इस कथनमें 'एषः' ( यह ) 'आत्मा' तथा 'ब्रह्म' ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए हैं और 'मे' अर्थात् 'मेरा' यह षष्ठ्यन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—इसके सिवा— स्मृतेश्च ॥ १ । २ । ६ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है ) । व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८ ) 'मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।' अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ( गीता ८ । ५) 'और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।' अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है ।
- ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणीमें देखे ।