भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध-छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित-एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और साँवाँसे भी छोटा बताया है; इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य- त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १ । २ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; अर्भकौकस्त्वात्=उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च=तथा; तद्व्यपदेशात्=उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न=वह ब्रह्म नहीं हो सकता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; निचाय्यत्वात्=क्योंकि (वह) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम्=उसके विषयमे ऐसा कहा गया है; च=तथा; व्योमवत्=वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है (इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)। व्याख्या—यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे धान, जौ, सरसों तथा साँवाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि उक्त मन्त्र- मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि- स्थानकी अपेक्षासे है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है। अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * (ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)† अतएव

  • तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। (ईशा० ५) † बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥ (गीता १३ । १५) 'वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरसे भी स्थित वही है।'