भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं। * परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, 'इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं। † सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं- विशेषाणाच्च ॥ १ । २ । १२ ॥ विशेषाणात् = (आगेके मन्त्रोंमें) दोनोंके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च = भी (उपर्युक्त दोनों भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)। व्याख्या-इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये 'अभय पद' बताया गया है। तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है। इस प्रकार उन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् विशेषण होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है। सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमें होती है, इसलिये उसे हृदयमें स्थित बताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिषद् (४।१५।१) में ऐसा कहा हे कि 'यह जो नेत्रमे पुरुष दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत हे, यही अभय और ब्रह्म है।' अतः यहाँ नेत्रमें स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अन्तर उपपत्तेः ॥ १ । २ । १३ ॥ अन्तरे = जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है; उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है। व्याख्या-यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त। प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

  • भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ( गीता ५ । २९ ) अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । ( गीता ९ । २३ ) † सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ ( गीता १३ । १४)