ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ३३ गया है। इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्णन आया है। अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है; क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और आँखमे दीखनेवाला पुरुष भी आँखके दोषोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्त्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है। इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि 'आँखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह आँखकी पलकोंमें ही रहती है, द्रष्टा पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकती।' सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५ ॥ च=तथा; सुखविशिष्टाभिधानात्=नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये; एव=भी (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)। व्याख्या—उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि 'यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।' इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व—ये दोनो ही सुखके सूचक हैं। तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो 'क' अर्थात् सुख है, वही 'ख' अर्थात् 'आकाश' है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है। इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है। सम्बन्ध—इसके सिवा, श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १ । २ । १६ ॥ श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात्=उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुषको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च=भी (यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या—इस प्रसङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात् देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहाँसे पुनः इस संसारमे न लौटनेकी बात बतायी गयी है; जो अन्यत्र वे० द० ३—