ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है ( प्र० उ० १ । १० ) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है । सम्बन्ध—यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा—इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १ । २ । १७ ॥ अनवस्थितेः = अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च = तथा; असम्भवात् = ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुण ) दूसरे किसीमें सम्भव न होनेसे; इतरः = ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न = नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है । व्याख्या—छाया-पुरुष या प्रतिबिम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिबिम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है । इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिने बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे सम्भव नहीं है; इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेंसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है।
- अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः । 'किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं, वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते ( प्राप्त कर लेते ) हैं । यही प्राणोंका केन्द्र है । यह अमृत और निर्भय पद है । यह परम गति है । इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध— पुनरावृत्ति-निवारक है ।'