ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ३५ सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह बात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अब पुनः अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति बतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १ । २ । १८ ॥ अधिदैवादिषु = अधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमें; अन्तर्यामी = जिसे अन्तर्यामी बतलाया गया है (वह परब्रह्म ही है); तद्धर्म- व्यपदेशात् = क्योंकि वहाँ उसीके धर्मोंका वर्णन है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिने याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विषयमें प्रश्न किया है; फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको बताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सम्पूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है—'वह अन्तर्यामी देखनेमे न आने- वाला किन्तु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सब कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न आनेवाला किन्तु स्वयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननेमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।' इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है—यही मानना ठीक है । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अब निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती— न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १ । २ । १९ ॥