भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ स्मार्तम्=सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान (जड प्रकृति); च=भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्माभिलापात्=क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है । व्याख्या—सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोंका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है; अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोंका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे 'अन्तर्यामी' के नामसे पर- ब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है । सम्बन्ध—यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता । परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है— शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १ । २ । २० ॥ शारीरः=शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च=भी; ( न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि=क्योकि; उभयेऽपि=माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्=इस जीवात्माको; भेदेन=अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते=अध्ययन करते है । व्याख्या—माध्यन्दिनी और काण्व—दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भाँति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है । इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ 'अन्तर्यामी' पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं । १. 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मान- मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' (शतपथब्रा० १४ । ५ । ३० ) २. 'यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान५ शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' ( बृ० उ० ३ । ७ । २२ ) 'जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता, जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।'