भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है—'प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल—ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होंने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ?' जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि 'इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं, हमलोग उन्हींके पास चले।' इस निश्चयके अनुसार वे पाँचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये। उन्हें देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि 'ये लोग मुझसे कुछ पूछेंगे, किन्तु मैं इन्हें पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा। अतः अच्छा हो कि मैं इन्हें पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा— 'आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता हैं। आइये, हम सब लोग उनके पास चले।' यों कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये। राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हें पर्याप्त धन देनेकी बात कही। इसपर उन महर्षियोंने कहा--'हमें धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये। हमें पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका हमारे लिये उपदेश करे।' राजाने दूसरे दिन उन्हें अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, 'इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?' उनमेंसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया— 'मैं 'द्युलोक'को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।' फिर सत्ययज्ञ बोले—'मैं सूर्यकी उपासना करता हूँ।' इन्द्रद्युम्नने कहा—'मैं वायुकी उपासना करता हूँ।' जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा--'आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते हैं; परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है; क्योंकि—'तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः।' अर्थात् 'उस इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका द्युलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है,