भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ ४१ पृथिवी दोनो चरण है, वेदी वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है।' इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहाँ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुषको ही वैश्वानर कहा गया है; क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है। सम्बन्ध-इसी बातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १ । २ । २५ ॥ स्मर्यमाणम्=स्मृतिमे जो विराट्स्वरूपका वर्णन है, वह; अनुमानम्= मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके 'परमेश्वर' होनेका निश्चय करानेवाला है; इति स्यात्=इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है। व्याख्या-महाभारत, शान्तिपर्व ( ४७ । ७० ) मे कहा है— 'यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥' 'अग्नि जिसका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।' इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति- के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिमे जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है। अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराट्स्वरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है। अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे 'वैश्वानर' शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्स्वरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिषद्मे ब्रह्मके चार पादोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है। वहाँ भी वह परमेश्वरके विराट्स्वरूपका ही वाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं— शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशाद- संभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ १ । २ । २६ ॥

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 62, कुल 417 में से · BharatKosha