ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नामरूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है।' ' इस प्रकार श्रुतिने परमपुरुष परमात्माको मुक्त ( ज्ञानी ) पुरुषोंके लिये प्राप्तव्य बताया है; इसलिये ( मु० उ० २।२।५ ) में द्युलोक और पृथिवी आदिके आधाररूपसे जिस 'आत्मा'का वर्णन आया है, वह 'जीवात्मा' नहीं, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही है। इसके पूर्ववर्ती चौथे मन्त्रमें भी परमात्माको जीवात्माका प्राप्य बताया गया है। वह मन्त्र इस प्रकार है-- 'प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ 'प्रणव तो धनुष है और जीवात्मा बाणके सदृश है। ब्रह्मको उसका लक्ष्य कहते है। प्रमादरहित ( सतत सावधान ) मनुष्यके द्वारा वह लक्ष्य बींधा जाने योग्य है; इसलिये साधकको उचित है कि उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमे तन्मय हो जाय-सब बन्धनोंसे मुक्त हो सदा परमेश्वरके चिन्तनमे ही तत्पर रहकर तन्मय हो जाय।' • इस प्रकार इस प्रसङ्गमे जगह-जगह परमात्माको जीवका प्राप्य बताये जानेके कारण पूर्वोक्त श्रुतिमे वर्णित द्युलोक आदिका आधारभूत आत्मा परब्रह्म ही हो सकता है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध-अब यहाँ यह शंका होती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत- प्रपञ्च जड प्रकृतिका कार्य है; कार्यका आधार कारण ही होता है; अतः प्रधान ( जड प्रकृति ) को ही सबका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं- नानुमानमतच्छब्दात् ॥ १ । ३ । ३ ॥ अनुमानम् = अनुमान-कल्पित प्रधान; न=द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार नहीं हो सकता; अतच्छब्दात् = क्योकि उसका प्रतिपादक कोई शब्द ( इस प्रकरणमे ) नहीं है। व्याख्या-इस प्रकरणमे ऐसा कोई शब्द नहीं प्रयुक्त हुआ है, जो जड प्रकृतिको स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार बताता हो। अतः उसे इनका आधार नहीं माना जा सकता। वह जगत्का कारण नहीं है, यह बात तो पहले ही -सिद्ध की जा चुकी है। अतः उसे कारण बताकर, इनका आधार माननेके लिये तो कोई सम्भावना ही नहीं है।