ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३-६ ] अध्याय १ ४९ सम्बन्ध—प्रकृतिका वाचक शब्द उस प्रकरणमें नहीं है, यह तो ठीक है ? परन्तु जीवात्माका वाचक 'आत्म' शब्द तो वहाँ है ही; अतः उसीको द्युलोक आदिका आधार माना जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं— प्राणभृच्च ॥ १ । ३ । ४ ॥ प्राणभृत् = प्राणधारी जीवात्मा; च = भी; ( न= ) द्युलोक आदिका आधार नहीं हो सकता; ( क्योंकि उसका वाचक शब्द भी इस प्रकरणमे नहीं है ) । व्याख्या—जैसे प्रकृतिका वाचक शब्द इस प्रकरणमे नहीं है, वैसे ही जीवात्माका बोधक शब्द भी नहीं प्रयुक्त हुआ है । 'आत्मा' शब्द अन्यत्र जीवात्माके अर्थमे प्रयुक्त होनेपर भी इस प्रकरणमे वह जीवात्माका वाचक नहीं है; क्योकि मु० उ० ( २ । २ । ७ ) मे इसके लिये 'आनन्दरूप' और 'अमृत' विशेषण दिये गये हैं; जो कि परब्रह्म परमात्माके ही अनुरूप है । इसलिये प्राणधारी जीवात्मा भी द्युलोक आदिका आधार नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—उपर्युक्त अभिप्रायकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण देते हैं— भेदव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । ५ ॥ भेदव्यपदेशात् = यहाँ कहे हुए आत्माको जीवात्मासे भिन्न बताये जानेके कारण; ( प्राणभृत् न= ) प्राणधारी जीवात्मा सबका आधार नहीं है । व्याख्या—इसी मन्त्र ( मु० उ० २ । २ । ५ ) मे यह बात कही गयी है कि 'उस आत्माको जानो ।' अतः ज्ञातव्य आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न होगा ही । इसी प्रकार आगेवाले मन्त्र ( मु० उ० ३ । १ । ७ ) मे उस आत्माको जाननेवालेकी हृदय-गुफामे छिपा हुआ बताया गया है । इससे भी ज्ञातव्य आत्माकी भिन्नता सिद्ध होती है; इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ द्युलोक आदिका आधार परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा नहीं । सम्बन्ध—यहाँ जीवात्मा और जड प्रकृति दोनो ही द्युलोक आदिके आधार नहीं हैं, इसमें दूसरा कारण बताते हैं— प्रकरणात् ॥ १ । ३ । ६ ॥ प्रकरणात् = यहाँ परब्रह्म परमात्माका प्रकरण है, इसलिये; ( भी यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और जड प्रकृति द्युलोक आदिके आधार नहीं है ) । वे० द० ४—