भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—इस प्रकरणमे आगे-पीछेके सभी मन्त्रोमे उस परमात्माको सर्वाधार, सबका कारण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् बताकर उसीको जीवात्माके लिये प्राप्तव्य ब्रह्म कहा है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और परमात्मा एक दूसरेसे भिन्न है तथा यहाँ बतलाया हुआ स्वर्ग और पृथिवी आदिका आधार वह परब्रह्म ही है; जीव या जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—इसके सिवा-- स्थित्यदनाभ्यां च ॥ १ । ३ । ७ ॥ स्थित्यदनाभ्याम् = एककी शरीरमे साक्षीरूपसे स्थिति और दूसरेके द्वारा सुख-दुःखप्रद विषयका उपभोग बताया गया है, इसलिये; च = भी ( जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है)। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( ३ । १ । १ ) मे कहा है— 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥' 'एक साथ रहते हुए परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते है। उन दोनोमेसे एक ( जीवात्मा ) तो उस वृक्षके कर्मफलरूप सुख-दुःखोंका स्वाद ले-लेकर ( आसक्तिपूर्वक ) उपभोग करता है, किन्तु दूसरा ( परमात्मा ) न खाता हुआ केवल देखता रहता है।' इस वर्णनमे जीवात्माको कर्मफलका भोक्ता तथा परमात्माको केवल साक्षीरूपसे स्थित रहनेवाला बताया गया है। इससे दोनोका भेद स्पष्ट है। अतः इस प्रकरणमे द्युलोक, पृथिवी आदि समस्त जड- चेतनात्मक जगत्का आधार परब्रह्म परमेश्वर ही सिद्ध होता है, जीवात्मा नहीं। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें यह बात कही गयी कि जिसे द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार बताया गया है, उसीको 'आत्मा' कहा गया है; अतः वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा नही। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के सातवें अध्यायमें नारदजीके द्वारा आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर सनत्कुमारजीने क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण और आशाको उत्तरोत्तर बड़ा बताया