ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ निन्ये।' ( श० ब्रा० ११ । ५ । ३ । १३ ) 'उसका उपनयन- संस्कार किया।' इत्यादि । इस प्रकार वेदविद्याके अध्ययनमें उपनयन आदि संस्कारोंका होना परम आवश्यक माना गया है तथा शूद्रोंके लिये उन संस्कारोंका विधान नहीं किया है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रोंका वेदविद्यामे अधिकार नहीं है । सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १ । ३ । ३७ ॥ तदभावनिर्धारणे=शिष्यमे शूद्रत्वका अभाव निश्चित करनेके लिये; प्रवृत्तेः=आचार्यकी प्रवृत्ति पायी जाती है, इससे; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि वेदाध्ययनमें शूद्रका अधिकार नहीं है ) । व्याख्या—जानश्रुति तथा रैक्वकी कथाके बाद ही सत्यकाम जावालका प्रसङ्ग इस प्रकार आया है—'जबालाके पुत्र सत्यकामने गौतमनामक आचार्यकी शरणमे जाकर कहा—'भगवन् ! मै ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक आपकी सेवामे रहनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।' तब गौतमने उसकी जातिका निश्चय करनेके लिये पूछा—'तेरा गोत्र क्या है ?' इसपर उसने स्पष्ट शब्दोमे कहा—'मैं अपना गोत्र नहीं जानता । मैंने अपनी मातासे गोत्र पूछा था, उसने कहा कि—'मुझे गोत्र नहीं मालूम है, मेरा नाम जवाला है और तेरा नाम सत्यकाम है।' इसलिये मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि 'मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' तब गुरुने कहा—'इतना स्पष्ट और सत्य भाषण ब्राह्मण ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।' इस प्रकार सत्य भाषणरूप हेतुसे यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं है, उसे आचार्य गौतमने समिधा लानेका आदेश दिया और उसका उपनयन-संस्कार कर दिया।' ( छा० उ० ४ । ४ । ३-५ ) इस तरह इस प्रकरणमे आचार्यद्वारा पहले यह निश्चय कर लिया गया कि 'सत्यकाम शूद्र नहीं, ब्राह्मण है, फिर उसका उपनयन-संस्कार करके उसे विद्याध्ययनका अधिकार प्रदान किया गया; इससे यही सिद्ध होता है कि शूद्रका वेद-विद्यामे अधिकार नहीं है ।