ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३७-३८ ] अध्याय १ ७३ सम्बन्ध—अब प्रमाण द्वारा शूद्रके वेद-विद्यामें अधिकारका निषेध करते हैं— श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३८ ॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् = शूद्रके लिये, वेदोंके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है, इससे; च=तथा; स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे भी ( यही सिद्ध होता है कि वेद-विद्यामे शूद्रका अधिकार नहीं है ) । व्याख्या—श्रुतिमे शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है । यथा—'एतच्छुश्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रस्य समीपे नाध्ये- तव्यम्।' अर्थात् 'जो शूद्र है, वह श्मशानके तुल्य है, अतः शूद्रके समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये ।' इसके द्वारा शूद्रके वेद-श्रवणका निषेध सूचित होता है । जब सुनने तकका निषेध है, तब अध्ययन और अर्थज्ञानका निषेध स्वतः सिद्ध हो जाता है । इससे तथा स्मृतिके वचनसे भी यही सिद्ध होता है कि 'शूद्रको वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है।' इस विषयमे पराशर-स्मृतिका वचन इस प्रकार है—'वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात् ।' ( १ । ७३ ) अर्थात् 'वेदके अक्षरोंका अर्थ समझनेके लिये विचार करनेपर शूद्र तत्काल पतित हो जाता है।' मनुस्मृतिमें भी कहा है कि 'न शूद्राय मतिं दद्यात्।' ( ४ । ८० ) अर्थात् 'शूद्रको वेद-विद्याका ज्ञान नहीं देना चाहिये।' इसी प्रकार अन्य स्मृतियोंमे भी जगह-जगह शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका निषेध किया गया है । इससे यही मानना चाहिये कि वेद- विद्यामे शूद्रका अधिकार नहीं है। इतिहासमे जो विदुर आदि शूद्रजातीय सत्पुरुषो- को ज्ञान प्राप्त होनेकी बात पायी जाती है, उसका भाव यो समझना चाहिये कि इतिहास-पुराणोको सुनने और पढ़नेमें चारो वर्णोंका समान रूपसे अधिकार है । इतिहास-पुराणोके द्वारा शूद्र भी परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार उसे भी भक्ति एवं ज्ञानका फल प्राप्त हो सकता है । फल-प्राप्तिमे कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान्की भक्तिद्वारा परम गति प्राप्त करनेमे मनुष्यमात्रका अधिकार है ( गीता ९ । ३२ ) । सम्बन्ध—यहाँतकके प्रकरणमें प्रसङ्गवश प्राप्त हुए अधिकारविषयक वर्णनको पूरा करके यह सिद्धान्त स्थिर किया कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका अधिकार है और शूद्रका अधिकार नहीं है। अब इस विषयको यहीं समाप्त करके