भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पुनः पूर्वोक्त अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया जाता है— कम्पनात् ॥ १ । ३ । ३९ ॥ ( पूर्वोक्त अङ्गुष्ठमात्र पुरुष परब्रह्म परमात्मा ही है; ) कम्पनात्=क्योंकि उसीमे सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उसीके भयसे सब काँपते हैं। व्याख्या—कठोपनिषद्के दूसरे अध्यायमे प्रथम वल्लीसे लेकर तृतीय वल्ली- तक अङ्गुष्ठमात्र पुरुषका प्रकरण आया है। ( देखिये २ । १ । १२, १३ तथा २ । ३ । १७ के मन्त्र ) । वहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके रूपमें वर्णित उस परम पुरुष परमात्माके प्रभावका वर्णन करते हुए यह बात कही गयी है कि— यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ( क० उ० २ । ३ । २ ) 'उस परमात्मासे निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह उस प्राणस्वरूप ब्रह्ममे ही चेष्टा करता है, उस उठे हुए वज्रके समान महान् भयानक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।' तथा— भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ( क० उ० २ । ३ । ३ ) 'इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे इन्द्र, वायु तथा पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब अपने-अपने कार्यमे दौड़ रहे हैं।' इस वर्णनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् जिसमे चेष्टा करता है अथवा जिसके भयसे कम्पित होकर सब देवता अपने-अपने कार्यम् संलग्न रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है और न इन्द्र ही। वायु और इन्द्र तो स्वयं ही उसकी आज्ञाका पालन करनेके लिये भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमे लेशमात्र भी संशयके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध—इस पादके चौदहवें सूत्रसे लेकर तेईसवेंतक 'दहराकाश' का प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्मा-