बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६ )
गया और उसने ब्रह्मज्ञानके लिये राजाकी ही शरण ली। राजा उसका हाथ पकड़कर महलके भीतर ले गया और वहां सोये हुए एक पुरुषके पास जाकर प्राणके अभिमानी चन्द्रमाके 'बृहत्, पाण्डरवास, सोम, राजन्' इत्यादि नाम लेकर पुकारा। किन्तु इन नामोंसे पुकारनेपर वह पुरुष नहीं उठा। तब राजाने उसे हाथसे दबाया और वह तुरंत उठकर खड़ा हो गया। इस प्रसङ्गद्वारा श्रुति यह बताती है कि जितने भी नाम-रूपाभिमानी देव हैं वे वस्तुतः विज्ञानमय आत्मा नहीं हैं; विज्ञानात्मा नाम-रूपसे परे है। सामान्यतया सर्वत्र व्याप्त होनेपर भी हृदयदेशमें उसकी विशेष अभिव्यक्ति होती है। वस्तुतः वही सबका प्रेरक और सच्चा भोक्ता है, अन्य इन्द्रियाभिमानी देव भी उसीकी विभूतियां हैं, उसकी सत्ताके बिना उनकी स्वतन्त्र शक्ति कुछ भी नहीं है। इन्द्रियोंको प्रेरित करनेके कारण ये प्राण हैं किन्तु प्राणोंका भी प्रेरक होनेसे वह प्राणोंका प्राण है।
इसी अध्यायके चौथे ब्राह्मणमें याज्ञवल्क्य और मैत्रेयीका संवाद है। याज्ञवल्क्यकी दो स्त्रियां थीं—मैत्रेयी और कात्यायनी। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी स्त्रियोंके समान बुद्धिवाली। सम्प्रदायभेदसे इसी उपनिषद्में यह प्रसङ्ग चतुर्थ अध्यायके पञ्चम ब्राह्मणमें फिर आया है। वहां इन दोनोंके विषयमें यह बात स्पष्ट कही है। जब याज्ञवल्क्यकी इच्छा संन्यास लेनेकी हुई और उन्होंने दोनों स्त्रियोंको अपनी सम्पत्ति बांटनेका प्रस्ताव किया तो कात्यायनीके मुखसे तो कुछ निकला नहीं, क्योंकि वह प्रेयःकामिनी थी, उस धनमें ही उसका सारा सुख निहित था; किन्तु मैत्रेयी थी श्रेयः-कामिनी। उसने कहा, 'यदि धनसे भरी हुई यह सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी ?' याज्ञवल्क्य बोले, 'धनसे अमरता-की आशा तो नहीं की जा सकती; हाँ, सम्पन्न पुरुषोंका जैसा भोगमय जीवन होता है वैसा ही तुम्हारा हो सकता है ?' बस, अब मैत्रेयीको सच्ची कुंजी हाथ आ गयी और उसने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? मुझे तो वही बात