बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 1402 में से
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बताइये जिससे मैं अमर हो सकूँ।' वस्तुतः यही विवेक और वैराग्य-का सच्चा स्वरूप है, जिसके हृदयमें यह वृत्ति जाग्रत् नहीं हुई वह किसी भी प्रकार परमार्थ-तत्त्वको ग्रहण नहीं कर सकता। मैत्रेयीकी उत्कट जिज्ञासा देखकर भगवान् याज्ञवल्क्यने उसे ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया। उन्होंने ब्रह्म और आत्माका अभेद प्रतिपादन करते हुए आत्माके लिये ही सबकी प्रियता, आत्मज्ञानसे ही सबका ज्ञान, आत्मासे भिन्न किसी भी वस्तुको देखनेमें पराभव, आत्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंके उत्पत्ति और प्रलय तथा अज्ञानमें ही अनात्मवस्तुओंकी सत्ता बताकर अन्तमें यह उपदेश किया कि जिसकी दृष्टिमें सब कुछ आत्मा ही हो जाता है उसके लिये कर्ता, क्रिया और करणका सर्वथा अभाव हो जाता हैं। वहाँ सूँघना, सुनना, मनन करना और जानना आदि कोई क्रिया नहीं रहती तथा वह आत्मतत्त्व किसीका ज्ञेय भी नहीं है, क्योंकि सबका ज्ञाता तो वह स्वयं ही है।
इसके आगे मधुब्राह्मण है। मधु अनेकों प्रकारके पुष्पोंका सार या कार्य होता है तथा पुष्प उसके कारण होते हैं। मधु उपकार्य है और पुष्प उपकारक हैं। यह उपकार्य उपकारकभाव ही इस ब्राह्मणमें 'मधु' नामसे कहा गया है। अतः यहाँ यह दिखाया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् और दिशा आदि सभी पदार्थ चारों भूतोंके कार्य हैं तथा भूत उनके कारण हैं। इस प्रकार उनका परस्पर उपकार्य-उपकारक सम्बन्ध है और इस नातेसे वे एक दूसरेके मधु हैं। यह तो हुई व्यावहारिक दृष्टि, किन्तु परमार्थतः उनका अधिष्ठान वह ज्योतिर्मय अमृतमय पुरुष ही है। वही उनका अध्यात्म—मूलभूत अर्थात् वास्तविक स्वरूप है। इसीका नाम आत्मा है और यह आत्मा ही अमृत ब्रह्म और सर्वरूप है। इस प्रकार इस ब्राह्मणमें अधिष्ठान-दृष्टिसे सम्पूर्ण प्रपञ्चकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन किया गया है और 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' (२।५।१६) इस श्रुतिसे स्पष्ट कह दिया है कि वह आत्मतत्त्व ही अपनी मायाशक्तिस अनेकों आकार धारण करके क्रीडा कर रहा है।