भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 1402 में से

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( ८ )

यहाँ मधुकाण्ड समाप्त होता है। इसके आगे दो अध्याय याज्ञवल्कीय काण्डके हैं। इसके आरम्भमें ही राजा जनकके बहुत दक्षिणावाले यज्ञका प्रसङ्ग है। उनके यहाँ पाञ्चालदेशके सभी विद्वान् ब्राह्मण एकत्रित हुए थे। उन्होंने यह घोषणा कर दी कि जो उनमें सबसे बड़ा ब्रह्मज्ञानी हो वह मेरी गौशालामें बँधी हुई दस सहस्र गौएँ जिनके सींगोंमें दस-दस सुवर्णमुद्रा बँधे हुए हैं, ले जाय। एकत्रित ब्राह्मणोंमेंसे किसीका ऐसा साहस न हुआ जो ब्रह्मज्ञानी जनकके सामने अपनेको सर्वश्रेष्ठ तत्त्ववेत्ता घोषित कर सके। उस समय याज्ञवल्क्यने उठकर अपने ब्रह्मचारीको आज्ञा दी कि इन गौओंको खोलकर ले जाओ। इससे ब्राह्मणोंमें बड़ा क्षोभ हुआ और उनमेंसे एकने पूछा कि क्या तुम ही हम सबमें विशेष ब्रह्मज्ञानी हो? इसपर याज्ञवल्क्यने जो उत्तर दिया वह एक सच्चे महानुभावके अनुरूप ही था। वे बोले ‘ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी इच्छावाले हैं।' इसके पश्चात् एक-एक करके उनमेंसे कई ब्राह्मणोंने याज्ञवल्क्यसे प्रश्न किये और उन्होंने उन्हें समाधानकारक उत्तर देकर शान्त कर दिया। अन्तमें गार्गी खड़ी हुई। ब्रह्मवादिनी गार्गीने इस लोकसे आरम्भ करके उत्तरोत्तर प्रत्येक कारणका कारण पूछा। अन्तमें जब ब्रह्मलोकका भी कारण पूछा तो याज्ञवल्क्यने उसे रोक दिया, क्योंकि यह अति प्रश्न था। जहाँ किसी विषयका निर्णय करनेके लिये प्रश्नोत्तर होता है वहाँ निःसन्दिग्ध वस्तुके विषयमें भी सन्देह करना एक अपराध माना जाता है। इसी प्रकारके नियमको भङ्ग करनेसे शाकल्यका सिर कट गया था, जिसका आगे नवें ब्राह्मणमें उल्लेख है। इसके पश्चात् याज्ञवल्क्यने प्रश्न किये, किन्तु उपस्थित ब्राह्मणोंमेंसे कोई भी उनका उत्तर देनेका साहस नहीं कर सका। इस प्रकार तृतीय अध्याय समाप्त होता है।

चतुर्थ अध्यायके प्रथम ब्राह्मणमें जनक और याज्ञवल्क्यका संवाद है। जनकने भिन्न-भिन्न आचार्योंसे वाक्, प्राण, चक्षु आदिको ही ब्रह्म-रूपसे सुना था। याज्ञवल्क्यने उनमेंसे प्रत्येकके आयतन ( गोलक ) और प्रतिष्ठा ( अधिष्ठान ) पूछे। किन्तु जनकने उन आचार्योंसे उनके