भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 1402 में से

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( ६ )

विषयमें कुछ सुना नहीं था। तब याज्ञवल्क्यजीने उनके आयतन और प्रतिष्ठा बताकर उनकी भिन्न-भिन्न प्रकारसे उपासना करनेका विधान किया और उनमेंसे प्रत्येककी उपासनासे देवलोककी प्राप्ति बतलायी। जनकने प्रत्येक उपासनाका फल सुननेपर उसीको परम पुरुषार्थ मानकर याज्ञवल्क्यको एक हजार गौ देना चाहा। किन्तु याज्ञवल्क्यने कहा कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना धन लेना मेरे पिताके सिद्धान्तके विरुद्ध है, इसलिये मैं यह दक्षिणा स्वीकार नहीं कर सकता। द्वितीय ब्राह्मणमें जनकको अधिकारी समझकर याज्ञवल्क्यजीने विराट्का वर्णन करते हुए उस सर्वात्माका प्रत्यगात्मामें उपसंहार करके परब्रह्मका उपदेश किया है। इससे जनक कृतकृत्यताका अनुभव करके अपना सारा राज्य गुरुदेवके चरणोंमें समर्पण कर देते हैं। इस प्रकार इस प्रकरणका उपसंहार होता है।

इस अध्यायके तीसरे और चौथे ब्राह्मणोंमें भी जनक और याज्ञवल्क्यका ही संवाद है। इस प्रकार यद्यपि याज्ञवल्क्य इस संकल्पसे गये थे कि मैं स्वयं जनकसे कुछ नहीं कहूँगा। परन्तु पहले वे उन्हें इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर दे चुके थे। इसलिये उन्होंने स्वयं ही प्रश्न कर दिया कि 'यह पुरुष किस ज्योतिवाला है?' बस, यहींसे प्रश्नोत्तरके क्रमसे इन दोनों ब्राह्मणोंमें आत्मतत्त्वका बड़े विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है। यहाँ विविध प्रकारसे यही निर्णय हुआ है कि आत्मा ही चरम ज्योति है। वह स्वयंप्रकाश है। स्वप्नावस्थामें वही सम्पूर्ण दृश्यको खड़ा कर लेता है। सम्पूर्ण विषयोंका भोक्ता होनेपर भी वह सर्वथा असंग है। सुषुप्तावस्थामें वह सारे प्रपञ्चका उपसंहार करके अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित रहता है। वही द्रष्टाकी दृष्टि, घ्राताकी घ्राति, रसयिताकी रसनाशक्ति, वक्ताकी उक्ति, श्रोताकी श्रुति, मन्ताकी मति और विज्ञाताकी विज्ञाति है। इस प्रकार सबका स्वरूप होनेसे उसका कभी अभाव नहीं होता, क्योंकि जब जो कुछ रहता है उसका वास्तविक स्वरूप स्वयं आत्मा ही है। इस प्रकार जब वही सबका स्वरूप है तो उक्त दृष्टि आदिके विषय भी उससे भिन्न नहीं हैं। अतः