बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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एक अलुप्तशक्तिस्वरूप द्रष्टा ही सर्वमय है, वही निरतिशय आनन्दस्वरूप है और उसीके लेशमात्र आनन्दसे अन्य सब विषय आनन्दरूप जान पड़ते हैं। वह आत्मा सर्वरूप है। जिसे ऐसा बोध हो गया है वह निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है। उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता। वह ब्रह्मरूप ही है और ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो जाता है। इसके आगे चतुर्थ अध्यायके अन्ततक याज्ञवल्क्यजीने बड़ी ओजपूर्ण भाषामें इसी तत्त्वका वर्णन किया है। फिर पञ्चम ब्राह्मणमें याज्ञवल्कीय काण्डकी पद्धतिसे पूर्वोक्त याज्ञवल्क्य-मैत्रेयि-संवादका ही वर्णन है और छठे ब्राह्मण में आचार्यपरम्पराके उल्लेखपूर्वक मधुकाण्ड समाप्त होता है।
इससे आगे पञ्चम अध्यायसे खिलकाण्ड आरम्भ होता है। इसमें कई प्रकारकी उपासनाओंका वर्णन है। आरम्भमें ही एक बड़ा रोचक आख्यान है। प्रजापतिके पुत्र देव, असुर और मनुष्य अपने पिताके यहाँ रहकर ब्रह्मचर्यका सेवन करते हैं और प्रजापतिसे उपदेश करनेकी प्रार्थना करते हैं। प्रजापति बारी-बारीसे उन तीनोंको एक ही अक्षर ‘द’ का उपदेश करते हैं और इस एक ही अक्षरसे उन्हें अपने-अपने लिये उपयुक्त उपदेश मिल जाता है। भोगप्रधान देवता समझते हैं, ‘पिताने हमें दमन (इन्द्रियसंयम) करनेका उपदेश किया है,’ क्रूरप्रकृति असुर समझते हैं, ‘प्रजापतिने हमें दया करनेका आदेश किया है’ और अर्थलोलुप मनुष्य मानते हैं, ‘पिताने हमें दान करनेकी आज्ञा दी है।’ इस प्रकार अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उपयुक्त उपदेश पाकर वे कृतकृत्य हो जाते हैं।
इसके सिवा इस अध्यायमें और भी कई प्रकारकी उपासनाएँ हैं। फिर छठे अध्यायके प्रथम ब्राह्मणमें इन्द्रियोंके विवादद्वारा प्राणकी उत्कृष्टता दिखायी गयी है तथा द्वितीय ब्राह्मणमें श्वेतकेतु और प्रवाहणका प्रसङ्ग है। श्वेतकेतु केवल शास्त्राध्ययन करके ही अपनेको विद्वान् मानने लगा था। वह राजसभामें अपनी विद्याकी धाक जमानेके उद्देश्यसे पाञ्चालनरेश प्रवाहणकी सभामें आया। राजाने उसे अभिमानी समझकर पाँच प्रश्न किये। उन प्रश्नोंका सम्बन्ध था जीवन-मरणकी समस्यासे। श्वेतकेतुसे उनका कुछ भी उत्तर न बना। तब वह उदास