भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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होकर अपने पिता और गुरु आरुणिके पास आया। उसने भी उन प्रश्नोंके विषयमें अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। तब वे पिता-पुत्र दोनों प्रवाहणके पास गये और उससे उन प्रश्नोंका उत्तर पूछा। प्रवाहणने उन्हें पञ्चाग्निविद्याका उपदेश किया। इस प्रसङ्गका निरूपण छान्दोग्योपनिषद्में भी है। शाखाभेदसे एक ही विद्याका अनेक स्थानोंपर उल्लेख हो जाता है।

इसके पश्चात् तीसरे और चौथे ब्राह्मणोंमें क्रमशः श्रीमन्थ और पुत्रमन्थ कर्मोंका वर्णन है। ये दोनों कर्म परस्परसम्बद्ध हैं। इनका प्रधान प्रयोजन सत्सन्ततिकी प्राप्ति है। पाँचवें ब्राह्मणमें खिलकाण्डकी आचार्य-परम्परा है। इस प्रकार यह उपनिषद् समाप्त होती है।

यहाँतक संक्षेपमें इस महाग्रन्थके प्रधान-प्रधान प्रसङ्गोंपर दृष्टिपात किया गया है। इस उपनिषद्की प्रतिपादन-शैली बहुत ही सुव्यवस्थित और युक्तियुक्त है। उपर्युक्त विवेचनके अनुसार इसमें दो दो अध्यायोंके मधु, याज्ञवल्कीय और खिलसंज्ञक तीन काण्ड हैं। इनमेंसे मधु और खिल काण्डोंमें प्रधानतया उपासनाका तथा याज्ञवल्कीय काण्डमें ज्ञानका विवेचन हुआ है। भाष्यकारने इसकी व्याख्या करते हुए अपना हृदय खोलकर रख दिया है। इसके भाषान्तरकी समाप्तिके साथ इन पंक्तियोंके लेखकके जीवनकी भी एक साध पूरी हो जाती है। आजसे प्रायः नौ वर्ष पूर्व इसके चित्तमें भगवान् शङ्कराचार्यके उपनिषद्भाष्यका अनुवाद करनेका संकल्प हुआ था। वस्तुतः वह सर्वान्तर्यामी श्रीहरिकी ही प्रेरणा थी। उनको लीलाका मर्म कुछ जाना नहीं जाता। वे न जाने किससे क्या काम कराना चाहते हैं और फिर उसे किस प्रकार पूरा करा लेते हैं—यह एक गम्भीर रहस्य ही है। अपनी विद्या-बुद्धिको देखते हुए ऐसा संकल्प करना मेरा दुःसाहस ही था। कोई विधिवत् अध्ययनका भी तो बल नहीं था। किन्तु भगवत्प्रेरणाके आगे सभीको झुकना पड़ता है; वे ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित कर देते हैं कि जिनके कारण शक्ति न देखते हुए भी मनुष्य साहस कर बैठता है। ऐसी किसी परिस्थितिने ही इसे भी इस