बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 16, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२ )
महत्कार्यमें नियुक्त कर दिया और कई प्रकारकी अड़चनोंके पश्चात् आजसे प्रायः साढ़े चार वर्ष पूर्व इसकी पूर्णाहुति हो गयी । इस महान् कर्मका मेरे लिये तो वस्तुतः इतना ही लाभ है कि इसी बहाने शास्त्रचिन्तनमें समय बीत जाता है । अस्तु, जो कुछ हो, प्रभुके विधानमें किसीका दखल भी तो नहीं चलता ।
इन उपनिषद्भाष्योंके अनुवादमें मुझे जिन ग्रन्थोंसे सहायता मिली है उनके लेखकोंका मैं सर्वदा ऋणी ही रहूँगा । हार्दिक धन्यवादके सिवा मेरे पास उस ऋणके परिशोधका कोई और साधन नहीं है । जिनके कृपामय सहयोगसे मुझे वे ग्रन्थ प्राप्त हो सके थे उन महानुभावोंका भी मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ । भाई साहब श्रीशंकरलालजी गर्गने पं० पीताम्बरजीका हिन्दी अनुवाद किया था । पूज्य पं० श्रीकृष्णजी पन्तकी कृपासे मुझे पं० दुर्गाचरण मजूमदारविरचित बँगला-अनुवाद मिला था तथा बन्धुवर कुँवर विजयेन्द्रसिंहजीने पं० गंगानाथ झा और श्रीसीताराम शास्त्रीके अंग्रेजी अनुवाद दिये थे । छपाईके समय सम्मान्य सुहृद्वर पं० श्रीरामनारायणजी शास्त्रीने इन सभी ग्रन्थोंका संशोधन और प्रूफ शोधन किया है । उनके अथक अध्यवसायके बिना इनका इतने शुद्धरूपमें प्रकाशित होना प्रायः असम्भव ही था । अतः उनका भी मैं सर्वदा ऋणी ही रहूँगा ।
अन्तमें, जिनकी असीम अनुकम्पा और बाह्य एवं आन्तर प्रेरणासे यह दुष्कर कार्य सुकरकी भाँति सम्पन्न हुआ है उन अपने हृदय-सर्वस्व पूज्यपाद श्रीगुरुदेवके पावन करकमलोंमें यह तुच्छ भेंट समर्पण करता हूँ । इसके द्वारा मैं किसी प्रकार उनके परम पवित्र पादपद्मोंका विशुद्ध प्रेम प्राप्त कर सकूँ—यही मेरी आन्तरिक अभिलाषा है ।
<div align="right">विनीत,
अनुवादक